जब भी देखूँ सोचूँ मन में

जब भी देखूँ सोचूँ मन में जल में थल में हो यां नभ मेंहर जगह हर पल पल मेंतू ही तू हर कण कण मेंजैसे बसी कला हर जीवन मेंकितने अध्भुत आकार बनाए चाहें भी तो गिन न पाएंकैसे कैसे रंग सजायेदेखें तो हम दंग रह जाएँतेरी तो हर बात निरालीसबके मन को मोहने वालीफिर भी जीवन एक पहेलीसुलझी कभी न सुलझनेवालीलीला तेरी है अति न्यारी सलोनी अध्भुत और प्यारी २ जिसपे जाती दुनिआ वारीपर अब ,तो सोच २ मैं हारी सुध हमारी भी लेलो मुरारीलागे अपनी ,फिर दुनिया सारी फिर न सोचूँ और न ही विचारूँबस हर पल तेरी राह निहारूँ

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12 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 06/10/2017
  2. kiran kapur gulati 06/10/2017
  3. C.M. Sharma 06/10/2017
    • kiran kapur gulati 06/10/2017
  4. डी. के. निवातिया 06/10/2017
    • kiran kapur gulati 06/10/2017
    • kiran kapur gulati 06/10/2017
  5. अरुण कान्त शुक्ला 06/10/2017
    • kiran kapur gulati 06/10/2017
  6. sarvajit singh 06/10/2017
  7. kiran kapur gulati 06/10/2017

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