चार लोग क्या कहेंगे

बड़े महंगे थे वो ख्वाब जो आज मुफ्त में बिक गए|एक दायरा बना के जिन्दगी का उसी में खप गये |परवाह थी कि चार लोग क्या कहेंगे ||जाना कहीं और था ,और किसी ओर ही गली मुड़ गए,जब उठने का समय आया तो करवट बदल फिर सो गये।डर था चार लोग क्या कहेंगे।।हिम्मत जुटा मन के तहखाने में ख्वाब नए ढूंढने हम फिर गए,पर उसे भी तमाशा वो एक नया बात हँसके चले गए।फिर दुनिया का ख्याल आया ,चार लोग क्या कहेंगे।।पूछा एक दिन खुद से ,कौन हैं ये चारा लोग जो इतना सस्ता भाव हमारा लगा गये ,अरमानों के जलते  अलाव को महज  राख वो बता उनको दफना गए।फिर  ध्यान आया कि छोडो ,चार लोग क्या कहेंगे।। 

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6 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/10/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/10/2017
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 02/10/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 02/10/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/10/2017

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