रावण का दर्द -प्रशान्त तिवारी

आज जले न जाने कितने रावण धूं-धूं कर केऔर सभी ने मांगी खुशियां सदा जो उनपे बरसे,क्या किसी ने फूंका अपने अंदर के रावण को,जो घूम रहे हैं बाहर या बैठे अंदर जो घर के?रावण की धधकती आँखें तड़प रही थी ज्वाला में,कोश रहा था राम को वो, दर्द भरी थी आंखों में,ढूंढ रही थी, पूँछ रही थी पास खड़े अनभिज्ञ थे जोबोलो राम हैं किसके अंदर, भीड़ खड़ी जो इसमें?रावण हंसा और फिर बोला बोल रहे ना क्यूं तुम सब,मुझपर तो हंसते हो तुम क्या अपनी हंसी उड़ाओगे?ना जाने कितने रावण अब जगह-जगह मिलते हैं,बोल सके क्या कोई इतने राम कहां से लाओगे?

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8 Comments

  1. C.M. Sharma 01/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी 01/10/2017
  2. Shishir "Madhukar" 01/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी 01/10/2017
  3. Madhu tiwari 02/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी 08/10/2017
  4. प्रशान्त तिवारी 08/10/2017

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