कवि हूँ मैं

कभी अतीत का जला हूँ तो कभी तंगहाली में पला हूँ।कवि हूँ साहेब, मैं लफ्जों के बाजार में बिका हूँ।।कभी क़लम की ढाल बना हूँ तो कभी स्याही के रंग में ढला हूँ।कागज़ का एक टुकड़ा हूँ जनाब, मैं हर कहानी का गवाह बना हूँ।।कभी किसी कहानी का किरदार तो कभी महफ़िल में शायर बन मिला हूँ।मैं वो आशिक़ हूँ दोस्त ,जो तारों की चाह में रात भर जला हूँं ।।कभी धुएं संग राख बन उड़ा तो कभी यादों के मर्म स्पर्श से जला हूँ।ख्वाबों का सौदागर हूँ हुज़ूर,मैं ख्वाहिशों की जहाज़ों संग उड़ा हूँ।। 

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4 Comments

  1. kiran kapur gulati 29/09/2017
  2. C.M. Sharma 29/09/2017
  3. अरुण कान्त शुक्ला 29/09/2017
  4. डी. के. निवातिया 03/10/2017

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