एक खामोश आवाज़(पूर्ण कविता)

जो सिर्फ बोल बन कर वीरगाथाओं और गीतों में एक आवाज़ बन कर गूंज रही है,
जो बस एक हिस्सा भर बन चंद पन्नो की किताब में शोला बन कर धधक रही है,
वो कहानी आज़ादी की है , क्रांति की है मेरे दोस्त।।
जिस  आस में चीथड़ों में लिपटी जो लाश सांसो की गुहार कर रही है
जिस साये में जो सिसकियाँ जवानी का गुबार
भर रही हैं
 वो चिंघाडें जुनून की हैं ,जोश की हैं मेरे दोस्त।।
जो खामोशी से इस संगदिल सल्तनत की रूह  से रिहाई मांग रही है
जो फख्र से काफिर के मज़हब की सलामती की दुआएं मांग रही है
वो फितरत ईमान की है,शख्शियत की है मेरे दोस्त।।
जो इश्तेहार सी अखबार में छप जाने की इजाजत मांग रही हैं
जो ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई में जाया उन साँसों का हिसाब मांग रही है
 वो तस्वीरें कुर्बान होने की हैं, शहादत की हैं मेरे दोस्त।।
जो सिर्फ बोल बन कर  गीतों में एक आवाज़ बन कर गूंज रही है,
वो कहानी आज़ादी की है , क्रांति की है मेरे दोस्त।।

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4 Comments

  1. C.M. Sharma 27/09/2017
    • Karma Vaahini 28/09/2017
  2. Shishir "Madhukar" 27/09/2017
    • Karma Vaahini 28/09/2017

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