लफ्ज़ फिसलने लगे — डी के निवातिया

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अधरों के पुष्प कँवल उनके खिलने लगे है !लगता है सनम से अब वो मिलने लगे है !!

कुछ तो असर जरूर हुआ उन पर इश्क कापास से गुजरते वक़्त कदम हिलने लगे है !!

गुफ्तगू में उनकी अदब का लहजा बदल गया !जुबान से उनकी अब लफ्ज़ फिसलने लगे है !!

कल तक बड़े मसखरे लिया करते थे सबके !अब कुछ कहते नहीं,लबो को सिलने लगे है !!

इसे मुहब्बत न कहे तो और क्या कहे “धर्म”सबसे नजरे चुराकर अब वो चलने लगे है !!

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डी के निवातिया

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10 Comments

  1. sarvajit singh 22/09/2017
  2. Shishir "Madhukar" 22/09/2017
  3. kiran kapur gulati 22/09/2017
  4. Rinki Raut 22/09/2017
  5. ANU MAHESHWARI 23/09/2017
  6. C.M. Sharma 23/09/2017
  7. Shyam tiwari 23/09/2017
  8. Arun Kant Shukla 24/09/2017
  9. Madhu tiwari 25/09/2017
  10. SALIM RAZA REWA 25/09/2017

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