प्रेम में मिलावट

प्रेम शुद्ध कांच सा निर्मल थाजब पेहली बार बचपन और यौवन के बीचहुआ धीरे-धीरे,जैसे-जैसे प्रेम कोसमझने की कोशिश कीप्रेम में मिलावट घुलता गयाप्रेम मिलावटी हो गयादोस्तों ने अपने रंग भरेकवि,गायक और फिल्म कारंग चढ़ता गयाप्रेम में मिलावट घुलता गयाप्रेम मिलावटी हो गयाहोश संभाला तो लगाप्रेम फैशन जैसा हैसब के पास होने लाज़मी थातो मैंने भीमोबाइल, कार और ज़ेवर जैसा रख लियाप्रेम में मिलावट घुलता गयाप्रेम मिलावटी हो गयाज़िन्दगी समझ में आई जबतब लगा प्रेम को शादी कहते हैऔर मैंने भी प्रेम कर लियाप्रेम में मिलावट घुलता गयाप्रेम मिलावटी हो गयाजब ज़िन्दगी कट रही थीतब लगा इसे ही प्रेम कहते हैजब दो इन्सान सिर्फ साथ रहते हैज़िन्दगी की दौड़ लगभग खत्म होने को हैलगता है प्रेम को समझ पाना मुश्किल नहीं थाबस करना इतना था की दुनिया की समझ से अपने प्रेम को बचाए रखना थाजिसे मैंने प्रेम समझावो सिर्फ लोगो के विचार थेदुनिया ने जिसे प्रेम माना वो प्रेम नहीं थाअगर होता तो वोमुझे दायरे में रहा कर प्रेम करने को नहीं कहतेकिसी जात,धर्म और देश से जोड़ कर प्रेम को नहीं देखतेबंधन को प्रेम नहीं कहतेदुनिया अपनी स्वर्थ कोप्रेम कहता रहाऔर प्रेम मिलावटी होता गयाप्रेम को भी बाज़ार में उम्र,जात,धर्म, औकाद के हिसाब से मिलावट कर बेचा गया प्रेम में मिलावट घुलता गयाप्रेम मिलावटी हो गयारिंकी

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16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 22/09/2017
    • Rinki Raut 22/09/2017
  2. डी. के. निवातिया 22/09/2017
    • Rinki Raut 22/09/2017
  3. sarvajit singh 22/09/2017
  4. sarvajit singh 22/09/2017
  5. kiran kapur gulati 22/09/2017
    • Rinki Raut 22/09/2017
  6. kiran kapur gulati 22/09/2017
    • Rinki Raut 22/09/2017
  7. C.M. Sharma 23/09/2017
    • Rinki Raut 23/09/2017
  8. ANU MAHESHWARI 23/09/2017
    • Rinki Raut 23/09/2017

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