अपना नसीब खुद बनाते हैं

अपना नसीब खुद बनाते हैंबड़ा ही बेदर्दसनम उनका निकलावो जां लुटा बैठेवो मैय्यत में भी न आया,इश्क अंधा होता हैवहां तक तो ठीक थावो अंधे होकर पीछे पीछे चल पड़ेये गजब हो गया,कुछ दिन पहले तकउन्हें लगता थाकहीं कोई दहशत नहींअब उन्हें लगता हैदहशत घुल गई हैआबो-ऐ–हवा में,वो रास्ता भटके हैंघर नहीं भूलेएक दिन लौट आयेंगे अपने घरहमें यकीं है,हम पहले भी कमैय्या थेकमा कर खाते थेहम आज भी कमैय्या हैंकमा कर खाते हैंतेरे नसीब से हमें कोई मतलब नहींहम अपना नसीब खुद बनाते हैं,अरुण कान्त शुक्ला24/9/2017

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 24/09/2017
  2. Arun Kant Shukla 24/09/2017
  3. C.M. Sharma 25/09/2017
  4. SALIM RAZA REWA 25/09/2017
  5. Madhu tiwari 25/09/2017
  6. अरुण कान्त शुक्ला 25/09/2017
  7. डी. के. निवातिया 25/09/2017
  8. sarvajit singh 25/09/2017

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