तूने दिल तोड़ा क्यूँ ऐसे – अजय कुमार मल्लाह

कुछ पा नहीं पाया कुछ खो नहीं सकता,तुने दिल तोड़ा है ऐसे कि मैं रो नहीं सकता,यकीं होता नहीं दिल को कहे ये हो नहीं सकता,तुने दिल तोड़ा है ऐसे कि मैं रो नहीं सकता।ज़ख़्म ऐसे दिए मुझको दर्द बढ़ता ही जाता है,बेहोशी छा रही ऐसी नशा चढ़ता ही जाता है,ये कैसी नींद दी तुने कि मैं सो नहीं सकता,तुने दिल तोड़ा है ऐसे कि मैं रो नहीं सकता।अपने जज़्बात ये किससे भला अब मैं बयां करूँ,उलझनें दे दी ये कैसी बता कि अब मैं क्या करूँ,अश्क़ों से अपनी आँखों को मैं धो नहीं सकता,तुने दिल तोड़ा है ऐसे कि मैं रो नहीं सकता।अगर इन्कार तु करती तो हँस के टाल देता मैं,सुनके कानों से ये बातें सब निकाल देता मैं,पर नफ़रत का तेरे बोझ मैं यूं ढो नहीं सकता,तुने दिल तोड़ा है ऐसे कि मैं रो नहीं सकता।

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3 Comments

  1. C.M. Sharma 15/09/2017
  2. Shishir "Madhukar" 15/09/2017
  3. डी. के. निवातिया 16/09/2017

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