दूसरा पिता वृक्ष

दूसरा पिता वृक्ष………………………..  काव्य विनय भारत शर्माजबलगाया था उसे कहाँ पता थाआज होगा बड़ाइतना देगा फल फूलपात्तियाँकाशदादा होते आजदेखकरउसे कहते”बड़ा हो गया है मेरा बेटा”कितनी ही मेहनतसे लगाया थाउन्होंनेये सपनाचिलचिलातीधूप में देकर पानीबचाई उसकी जानदिया था नयाजीवनतब सेउन्हें वह पसंद थापुत्र समानआज दादा तो नहीपरसाथ हैंउनकी यादेंउनके आशीषसाथ में उनका ये परिश्रमकहती थी दादी -क्यों इतना सोचते होइस के बारे में”पेड़ ही तो है,परिवार थोड़े है”पर दादा,न सुनते थेउनकी एक भी,खुद खाने से पहलेदेते थे खादपानीमानो उनके बुढापे का हो सहाराइसीलिएआज हष्ट पुष्ट ह् उनकाये पुत्रया मेरा पितृसमानअंशजैसे इसने घी खाया हो डटकरखड़ा है उन्मुक्तआकाश की ओरलेकिन कब तकरहेगा यूंखड़ाआज सोचता हूँमैंकल ही पिता को कहते सुना था”खेत में लगेइस पेडको पड़ेगा काटना”फ़ार्म हाउसके लिएमैं इसे नही मरनेदूंगाआखिरकैसे एक पितामार देगाअपने ही समानदूसरे कोनिज स्वार्थ के लिएकविविनय भारत शर्मा

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  1. shivdutt 12/09/2017

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