अन्धकार।।

बच्चे दौड़ लगा रहें हैंउड़ान भरना चाहते हैंबादलों में छुपे आसमां की ओरचाँद कुछ खिलखिलाया सा बैठा है फलक परसूरज बहुत उदास हैआते ही चला गया जैसे ग्रहण लगा होदुखों के सागर मेंलोग फिर भी जीवित हैबच्चों को दौड़ता देखबच्चों की दौड़ गर्त की ओरसपने और आशाएँ पड़ीं हैंधूमिल उसी गर्त मेंहुकूमत है,डर है,आवाजें हैं,चीख-पुकार हैअन्ततः एक मधुर संगीत हैपर विरोध नही। मशीनों के नवीनीकरण का परिणाम हैजिसमें चाल तो है पर ध्वनि नहीफिर भी एक ध्वनि शेष हैजिसकी आदत सी लग गयी है हमें।

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11 Comments

  1. babucm 08/09/2017
    • अभिनय शुक्ला 12/09/2017
    • अभिनय शुक्ला 12/09/2017
  2. डी. के. निवातिया 08/09/2017
    • अभिनय शुक्ला 12/09/2017
  3. Bindeshwar Prasad sharma 08/09/2017
    • अभिनय शुक्ला 12/09/2017
  4. Shishir "Madhukar" 08/09/2017
  5. Madhu tiwari 08/09/2017
  6. ANU MAHESHWARI 08/09/2017

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