पल चार

मिले हैं पल चार इनको ही सजाना है फ़साना नहीं कुछ और बस आना और जाना है रुक सका न कोई फिर कैसा बसना बसाना है रीत है सदियों पुरानी सबने इसे निभाना है भटक रहे जन्मों से हम कोई ठौर न ठिकाना है ज़िन्दगि तो इक कहानी है हमें तो भूमिका ही निभाना है कहाँ बच सका है कोई मौत तो इक बहाना है क्या हूँ मैं और मेरा क्या अन्त सब यहीं छूट जाना है हम बुनते हैं जाल सुनहरेफिर देते हैं उनपे पहरे सुखों का तो कहना ही क्या दुखों को भी गले लगाना है कैसी ज़िन्दगी है कैसा अजब फ़साना है इस फ़रेब को तो हमने ज़रा हँस के ही निभाना है

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16 Comments

  1. babucm 05/09/2017
    • kiran kapur gulati 06/09/2017
  2. Shishir "Madhukar" 05/09/2017
    • kiran kapur gulati 06/09/2017
    • kiran kapur gulati 06/09/2017
  3. डी. के. निवातिया 05/09/2017
    • kiran kapur gulati 06/09/2017
  4. ANU MAHESHWARI 05/09/2017
    • kiran kapur gulati 06/09/2017
  5. Meena Bhardwaj 05/09/2017
    • kiran kapur gulati 06/09/2017
  6. Madhu tiwari 05/09/2017
  7. kiran kapur gulati 06/09/2017
  8. Mohit Chahar 06/09/2017
    • kiran kapur gulati 07/09/2017

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