कित -कित खेलवाली बचपन

कित -कित खेलवाली बचपन —-चंद्र मोहन किस्कू ———————————-नगर की कंक्रीट जंगल में खो गई है मेरी कित -कित खेलवाली बचपन आंगन,जंहा लेटकर दादाजी से कहानी सुनता था अब वह सिकुड़ गया है और घर के भीतर घुस गया है कुल्हि पिण्डा और मांझी छाटका भी अब नहीं है वह अब कॉलोनी गया है कथा बाँचना -गप्पे हाँकना और नाच -गान अब टेलीविजन पर ही दिखाई देता है बड़ी -बड़ी मैदान जहाँ खेलती रहती थी तितलियों के पीछे भगति थी वह अब नहीं है वहाँ अब ऊँची -ऊँची गगनचुम्बी घर बानी है जंगल,जहाँ से मुझे केन्दु-चार खाने को मिलता था छत्तू ,पुटका छात्तु संग्रह करने जाती थी वह भी अब नहीं है वहां अब बड़ी -बड़ी होर्डिंग और मोबाइल टॉवर से घना हो गया है पहाड़ी घाटी और झरनों के किनारे जहां पर पंक्षीयों की समधुर गीत गूंजती रहती थी वहां अब खनिज माफियाओं की बोम विस्फोट और गड्डी -मोटर की शोर से भरा हुआ है मौसम भी अब बदल गई है समय पर वर्षा नहीं हो रही है और ऋतुएँ यहां आने से पहले ही डरकर भाग रही है मेरी कित -कित वाली खेल घर-दुवार,वर-वधूवाली खेल चारागाह की बाघ-बकरीवाली खेल गुल्लीडंडा की गुल्ली और डंडा इस कंक्रीट दानव ने निगल लिया है माँ भी अब मातृभाषा में लोरी न सुनाकर अंग्रेजी में गाकर सुलाती है मुझे लेटो,पीठा और डूबोग खाना तो दूर की बात दिखाई भी नहीं देता अब उसी जगह पर अब चौमिन ,पिज्जा,वर्गर और शीतल पेय से भर गया है। लेटो ,पीठा ,डूबोग =एक खास तरह का पकवान ,संताल आदिवासी इसे बड़े चाव से खाते है।

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8 Comments

  1. Bindeshwar Prasad sharma 04/09/2017
    • chandramohan kisku 04/09/2017
  2. babucm 05/09/2017
    • chandramohan kisku 08/09/2017
    • chandramohan kisku 08/09/2017
  3. डी. के. निवातिया 05/09/2017
  4. chandramohan kisku 08/09/2017

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