अपराजिता,,

हूँ आज मैं यह सोंचती यह है मेरा प्रतिकार शायदक्यूँ तू लज्जित आज खुद परहै तुम पर मेरा अधिकार शायदहै आज क्यों यह हृदय विकलक्यूँ अश्रुपूर्ण है नेत्र सज़लक्यूँ आज हूँ मैं “पराजिता “मैं थी कभी “अपराजिता “….हूँ अकेली इस धरा पर आज मैं यह मानतीहै काँटों से पहचान मेरीबात मैं यह जानती कोई पथिक न साथ है न राह का साथी कोईहै दिया बुझने लगा अब न पास अब बाती कोई ,चल रही हूँ मैं निरंतरपर कदम थकते नहींदृष्टि से ओझल मंज़िल मेरीपर कदम रुकते नहींहार कर भी जीतने का प्रयास कर रही हूँअपने अंदर के आत्मबल का मैं विकास कर रही हूँनहीं बनना मुझे “पराजिता “मैं हूँ “अपराजिता ” ,मैं हूँ “अपराजिता “……।सीमा “अपराजिता “

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7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 04/09/2017
  2. डी. के. निवातिया 04/09/2017
  3. ANU MAHESHWARI 04/09/2017
  4. Madhu tiwari 04/09/2017
  5. babucm 04/09/2017
  6. kiran kapur gulati 05/09/2017

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