कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को

कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को

 कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय
जितना भी कुछ भुलाने कादिन में प्रयास किया जाता हैअनायास ही सब एक-एक करमेरे सम्मुख चला आता हैकितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को….असंख्य तारे जब साथ होते हैउस आसमान की छत परमैं खुद को ढूढ़ने लगता हूँ तबकिसी कागज़ के ख़त परधीरे धीरे यादों का एक फिरघेरा सा बनता हैकोई किरदार जी उठताकोई किरदार मरता हैमुकम्मल नहीं होता है यादों का बसेरारेत सा  बिखरता हैकुछ समेटकर उससे सम्हल जाता हैकितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को….सन्नाटे में जब तुम्हे सुनने कीआस जगती हैतुम्हारे लम्स को सोचूँ तो फिरप्यास लगती हैकभी असीमित आकाश में वोथक चुका पंछीनहीं धरती कही उसको अबपास दिखती हैएक आँख झूमती मस्ती में दूजीउदास लगती है ||जब एक आँख से हिमखंडपिघल जाता है ||कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को….

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12 Comments

  1. Madhu tiwari 31/08/2017
  2. डी. के. निवातिया 31/08/2017
  3. Vikram jajbaati 31/08/2017
  4. ANU MAHESHWARI 01/09/2017
  5. babucm 01/09/2017

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