माँ का प्रेम

हवा की सरसराहट, ऐसा लगता हैकोई धुन गुनगुनाती हुई माँहौले से पुकार रही है मुझेछलक जाती है आज भी आँखेंउस प्यार के एहसास सेजो कराया था माँ ने मुझेए हवा!  माँ  जहाँ भी होउनको छूकर वो एहसासफिर से करा जा मुझेमाँ के जीवन में न समझ पाईउसके निश्छल प्रेम को कभीछीनकर माँ को वक्त नेप्रेम का अर्थ समझाया मुझेए बंदे!  माँ के जीवन में हीपा लेना माँ  और  माँ का प्रेमखोकर  उस निश्छल  प्रेम कोचैन न मिल पाएगा कभी तुझेहे ईश्वर अगर तूने हर इंसान कोमाँ का दिल लगाया होताइस संसार का नजारा कुछ और ही होतानफरत न  होती दिलों  मेंबस  प्यार ही प्यार होता .-संध्या गोलछा

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10 Comments

  1. Madhu tiwari 27/08/2017
    • Sandhya Golchha 30/08/2017
    • Sandhya Golchha 30/08/2017
  2. babucm 28/08/2017
    • Sandhya Golchha 30/08/2017
  3. डी. के. निवातिया 28/08/2017
    • Sandhya Golchha 30/08/2017
  4. Shishir "Madhukar" 28/08/2017
    • Sandhya Golchha 30/08/2017

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