मंजिल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा ( बिन्दु )

गिरता है फिसलता है रेंगता हुआ आगे बढता तो है। आशा और लगन है पूरा भरोसा हैइस विश्वास में अपने आप से लड़ता तो है। न मुड़ता है न पीछे देखता है एक हौसला लिए ऊपर चढ़ता तो है। न निराशा मन में न जिज्ञासा दिल में एक जुनून लेकर अपने आप में संहलता तो है। एक ख्वाहिश एक मुस्कान एक संकल्प लेकर अपनी तकदीर लिखता तो है। एक ही लक्ष्य एक ही ध्यानअपने मनो ज्ञान से मंजिल को पाता तो है।

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8 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 27/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 27/08/2017
  2. Madhu tiwari 27/08/2017
  3. Meena Bhardwaj 27/08/2017
  4. babucm 28/08/2017
  5. डी. के. निवातिया 28/08/2017
  6. Shishir "Madhukar" 28/08/2017

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