लफ्ज़ मेरे — डी के निवातिया

लफ्ज़ मेरे

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लफ्ज़ मेरे एक रोज़ ज़माना बोल रहा होगारफ्ता रफ्ता सबके वो राज़ खोल रहा होगा !!

ज्यों ज्यों पढ़े जायेंगे पन्ने उलझी डायरी केना जाने कितनो का मन  डोल रहा होगा !!

कोई बैठा होगा उदास तन्हाई में मेरे बगैरकोई कर्मो को नेकी बदी में तोल रहा होगा !!

कलयुग में वो भी करेगा प्रवचन बड़े मंचो सेजिसका न कोई इतिहास,न भूगोल रहा होगा

याद करेगा “धर्म” तुझको हर कोई यहां परअगर ज़माने में तेरा कोई मोल रहा होगा !!

!!!डी के निवातिया

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25 Comments

  1. Abhishek Rajhans 23/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
      • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  2. Madhu tiwari 23/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  3. Shishir "Madhukar" 23/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  4. babucm 24/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  5. ANU MAHESHWARI 24/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  6. Bindeshwar Prasad sharma 24/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  7. Meena Bhardwaj 25/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  8. Rajeev Gupta 26/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  9. ALKA 26/08/2017
    • डी. के. निवातिया 11/09/2017
  10. kiran kapur gulati 21/09/2017
  11. DK Nivatiya 21/09/2017
  12. Rinki Raut 22/09/2017

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