विरह – प्रियंका ‘अलका’

बादल सूनाधरा है प्यासीघूँट- घूँट तेराप्रेम पीया जोबन गई तेरी दासीबन गई तेरी दासी…….आग की लपटें धधके जैसे विरह की ज्वालाफैले वैसे..अब क्या सूरजक्या चंदा देखूँविरह में मैं जग भूलूँपांव के नीचे कांटा या कंकड़लहू को पानी जानूँलहू को पानी जानूँ….. मैं पगलीतेरे भ्रम से भरमाईहर ओर तुझे हीं खोजूँतेरे प्रेम को सच्चा पाया था तूझे झूठा कैसे बोलूँतूझे झूठा कैसे बोलूँ……… – अलका

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8 Comments

  1. Madhu tiwari 20/08/2017
  2. Meena Bhardwaj 20/08/2017
  3. Swati 20/08/2017
  4. Shishir "Madhukar" 21/08/2017
  5. babucm 21/08/2017
  6. डी. के. निवातिया 21/08/2017
  7. Kajalsoni 22/08/2017

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