साम्प्रदायिक हृदय

धर्म उन्माद मे भटके युवाओं को धर्म निरपेक्षता का सही अर्थ समझाता ,नागरिक भारत का,एक धर्म मेरा भी ,पर इंसानियत इंसान को ही बताता ।ये जज्बाती इंसान ढूंढ़ता है ,सच्चा हिन्दू-सच्चा मुसलमान ढूंढ़ता है ,आम आदमी तो बस रोटी की तलाश मे रोज़ी ही ढूंढ़ता है ।धर्म का धंधा,धर्म से आतंकवाद और कितने ख़ंज़र बनाओगे ,घाव के बदेले घाव आखिर कब तक देते जाओगे ।देश विद्रोह के हंगामे तकसीम की साजिश है ,हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई अब तो बस कहानी है ।व्यवस्था ने सम्प्रदाय का पेहरी बनाया भारत माता सर्वोच्च रेहती है,देश की अंधी अबाम तो दंगो मे जलती-जलाते मिलती है ।सिसकियों ने नफ़रत समेटे रखा है खामोशी ने दंगे का जवाब छुपाया रखा है ,राख महजब क्या है ये जज्बाती पूछता है ?आधे बहाता आधे दफनाता है । -विक्रम जज्बाती

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10 Comments

  1. डी. के. निवातिया 17/08/2017
    • Vikram jajbaati 17/08/2017
  2. Kajalsoni 17/08/2017
    • Vikram jajbaati 17/08/2017
  3. babucm 18/08/2017
    • Vikram jajbaati 18/08/2017
    • Vikram jajbaati 18/08/2017
  4. madhu tiwari 18/08/2017
    • Vikram jajbaati 19/08/2017

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