अपना देश – डी के निवातिया

अपना देश

*** *** ***

अलग अलग है भाषा अपनी, अलग अलग है वेशराम चन्द्र जी जहाँ धरे थे, सन्यासी का भेषबहें प्रेम की गंगा जमुना, आपस मे है प्रेमनहीं मिलेगी धरती ऐसी, जैसा अपना देश ||

***

*डी के निवातियाँ*

यह रचना *सरसी छंद* पर रचित है । इसका मात्रिक आधार 16, 11 मात्राओं पर निर्भर, अंत मे गुरु लघु अनिवार्य।

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

16 Comments

  1. kiran kapur gulati 17/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
  2. babucm 17/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
  3. Shishir "Madhukar" 17/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
  4. Vikram jajbaati 17/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
  5. Meena Bhardwaj 17/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
  6. Kajalsoni 17/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017
  7. madhu tiwari 18/08/2017
    • डी. के. निवातिया 25/08/2017

Leave a Reply