सन्नाटे में छिप जाती है … भूपेन्द्र कुमार दवे

 सन्नाटे में छिप जाती हैहर पीड़ा की आवाज कहीं।इसको सुनने जो कतरातेउनको होती है लाज नहीं। इस कारण जब ठोकर खायीइस पीड़ा ने तब उफ् न कियापथ के पत्थर चूम चूमकरघायल पथ का श्रंगार किया। कहने को थी आगे मंजिलपर रुकने का साहस न मिला।नम पलकों से आँखों ने भीहर आँसू का संहार किया। अधरों था अंकुश पीड़ा काखोल सका ना मन राज कहीं।सन्नाटे में छिप जाती हैहर पीड़ा की आवाज कहीं। काँटे हर पीड़ा के चुनकेस्वप्न नीड़ का तैयार कियाआहों ने तब चुपके चुपकेस्वप्न सलोना बर्बाद किया। गम भी था बस एक पखेरूजिसने सब स्वीकार किया।दर्द भरी व्याकुल साँसों नेबस पतझर से संवाद किया। क्या नयनों से नीर बहायेंगम का होता अंदाज नहीं।सन्नाटे में छिप जाती हैहर पीड़ा की आवाज कहीं। जब आस गई तो साँस थकीथा अजब दर्द इस क्रीड़ा मेंउमर अकेली बुढ़ी होतीजब साँसें थकती पीड़ा में। यही देखकर प्राण सेज परठठरी भी उखडूँ बैठी थीचला-चली की बेला में भीपीड़ा भी ज्यादा रूठी थी। कहती थी मत छेड़ तार तूबजने न लगे हर साज कहीं।सन्नाटे में छिप जाती हैहर पीड़ा की आवाज कहीं। मूक वेदना सहते सहतेचीख पड़ी तब पीड़ा मन मेंथरथर कँपता था आँसू भीपलकों में कुछ अंतर्मन में ढूँढ़ रहा था तार साज केमन भी अपने सूनेपन मेंशब्द दर्द के मूक बने थेकंपित लब के सूनेपन में। पीड़ा थी वो शब्द दबायेजिसे मिला अर्थ-ताज नहींसन्नाटे में छिप जाती हैहर पीड़ा की आवाज कहीं।           … भूपेन्द्र कुमार दवे                00000

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13 Comments

  1. Madhu tiwari 12/08/2017
    • bhupendradave 12/08/2017
  2. kiran kapur gulati 12/08/2017
    • bhupendradave 12/08/2017
    • bhupendradave 12/08/2017
  3. Kajalsoni 12/08/2017
    • bhupendradave 12/08/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 12/08/2017
    • bhupendradave 12/08/2017
  5. Shishir "Madhukar" 12/08/2017
    • bhupendradave 12/08/2017
  6. babucm 12/08/2017

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