कलियुग – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

अरबों बरस की इस धरती पर कितने कलियुग आये। इस बार भी आया है कलियुग युग आये और युग जाये। चारो युग जिवन्त वेद में युग है माया की नगरी। कहीं धूप कहीं छाव है भैया विष, कहीं अमृत की गगरी। कहीं छल, स्वार्थ कहीं पर कहीं पर लालच ईष्या। नफरत तो ऐसे फैला हैलगता है सब मिथ्या। क्यों नहीं विश्वास है सबको क्यों दुनिया में आये। क्यों छोड़ रहे धर्म – संस्कृति उनको अब हम अपनाये। ज्ञान पाकर अज्ञानी बनते क्यों करते नादानी। प्रेम की भाषा सीखनी हैहम क्यों बनते अभिमानी। द्वापर – त्रेता – सतयुग काइतिहास उलट कर देखो। मानुष का उत्थान यहां पर विचार बिन्दु बदलकर देखो।

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20 Comments

  1. Madhu tiwari 09/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  2. Shishir "Madhukar" 10/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  3. babucm 10/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  4. ANU MAHESHWARI 10/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  5. anjali yadav 10/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  6. Meena Bhardwaj 10/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  7. kiran kapur gulati 11/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  8. डी. के. निवातिया 11/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017
  9. Kajalsoni 11/08/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 11/08/2017

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