दिव्य प्रेम – शिशिर मधुकर

कुछ भी मिल जाए मुझको पर जो सुख तुमसे मिलता हैचेहरे की तो बात ही क्या मेरा हर अंग फिर तो खिलता है गहरे घाव छुपा कर अक्सर यहाँ लोग जिंदगियां जीते हैं सच्ची प्रीत का धागा ही दिल की सब चोटों को सिलता है दिव्य प्रेम इस जग में जब भी दो लोगों के बीच में होता है सारा आलम रुक जाता है तब और पत्ता एक न हिलता है ख्वाबों में बस बस के कोई जब सांसों में भी रम जाता हैउस हाल में तन्हाई का मंजर आसान हो के ना झिलता हैश्रद्धा विश्वास जो दिल में हो मुश्किल आसां हो जाती हैपथरीली राहों में मधुकर फिर तो पैर कभी ना छिलता हैशिशिर मधुकर

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20 Comments

  1. Madhu tiwari 08/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 08/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 08/08/2017
  2. ANJALI YADAV 08/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 08/08/2017
  3. Meena Bhardwaj 08/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 08/08/2017
  4. babucm 08/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 09/08/2017
  5. ANU MAHESHWARI 09/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 09/08/2017
  6. डी. के. निवातिया 09/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 09/08/2017
  7. bhupendradave 09/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 09/08/2017
  8. Bindeshwar Prasad sharma 09/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 09/08/2017
  9. Kajalsoni 09/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 09/08/2017

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