दूर होगा एकदिन यह अंधेरा – अनु महेश्वरी

जब विरोध के लिए ही, विरोध होता है,तब कहाँ किसी का कभी भला होता है,सब चमकाते राजनीति, अपनी,जनता रह जाती बस, ठगी सी,बेमतलब की बहस खूब चलती है,आरोपो के दौर भी खूब चलते है,चेहरे पे सबके है, नकली चेहरे,जनता पहचाने कैसे असली चेहरे?राजनीति करते है सब यहाँ,कोई धर्म की,कोई जातपात की,कोई तु‍ष्टीकरण की,भोली जनता को बस वर्गलाना,अपना वोट बैंक इन्हें है बनाना,देश की फिक्र, कब इन्हे सताती,नज़रो के सामने कुर्शी जो रहती|आज़ादी के इतने साल बाद भी,है अशिक्षा, भ्रस्टाचार और गरीबी,लगता सब कुछ बिखरा बिखरा सा,चमन कुछ उजरा हुआ सा,सवाल बहुत उठते है, मन में,पर फंसे सभी अपनी ज़िन्दगी में,जरूरतों के लिए, लड़ती ज़िन्दगी,सामाजिक सुरक्षा की है भारी कमी,कहाँ जुड़ पाते है हम कभी,देश के बारे में जो सोचे सभी?बस वोट देने से ख़तम नहीं होती है ज़िम्मेदारी,अब सही समय पे आवाज़ उठाना भी है जरुरी,बाहर निकले अपनी उदासीनता को तोड़कर,मत का प्रयोग करे जात-धर्म से ऊपर उठकर,चुने हर प्रत्यासी सही सभी,न आए झांसे में अब कभी,अपनी ज़िन्दगी के बाहर भी झाँके हम, अब,देश के प्रति अपने फ़र्ज़ को भी निभाए, सब,जहाँ जागो वही होता सवेरा,दूर होगा एकदिन यह अंधेरा| अनु महेश्वरीचेन्नई

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14 Comments

  1. mani 05/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 07/08/2017
  2. Shishir "Madhukar" 05/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 07/08/2017
  3. kiran kapur gulati 06/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 07/08/2017
  4. kiran kapur gulati 06/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 07/08/2017
  5. babucm 06/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 07/08/2017
  6. madhu tiwari 06/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 07/08/2017
  7. Kajalsoni 09/08/2017
    • ANU MAHESHWARI 10/08/2017

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