वो लम्हें निकल गए – शिशिर मधुकर

जिनमें सुकूं मिला मुझे वो लम्हें निकल गए सपनों के सभी आशियां धू धू हो जल गए चट्टान सा मिला ना मुझे रिश्ता कोई यहाँ मौसम गर्म हुआ तो सब हिम से पिघल गए अपनों का साथ जिंदगी में ग़म का इलाज है वो क्या करें जिन्हें यहाँ अपने ही छल गए चोटें लगी हो जिनको वो ही जानते है पीर इसी राज़ के सहारे हम भी संभल गए तोहमत लगाने वालों सुनो मधुकर की ये सदाप्यासे को जहाँ पानी मिला अरमां मचल गएशिशिर मधुकर

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14 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 04/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  2. babucm 04/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  3. Meena Bhardwaj 04/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  4. Kajalsoni 04/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  5. डी. के. निवातिया 04/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  6. Bindeshwar Prasad sharma 04/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  7. mani 05/08/2017
    • Shishir "Madhukar" 05/08/2017

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