ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है

ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया हैजीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है। अपनी पीड़ा सहते सहतेऊब गया तो तब फिर मैंनेजीवन पथ पर चलते चलतेव्यथा जगत की जानी मैंनेथा पीड़ा का विस्तार अनंतअपनाकर दुख-दर्द सभी का कुछ क्षण जीना सीख लिया हैजीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है। हाथ पकड़कर प्रभु का मैंनेसीखा बिन बैसाखी चलनासीख लिया तब उनसे मैंनेऔरों की भी पीड़ा हरनाचल पड़ा तभी से सबके संगखुद बैसाखी बन औरों को मंजिल देना सीख लिया हैजीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है। न थी हवेली, ना था बंगलाकहने को थी बस इक छतरीयहीं सजा था तेरा डेरालेकर मुस्कानों की छतरीबैठा था तू निर्धन के संगतब फुटपाथ पर मुस्कानों का महल बनाना सीख लिया हैजीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है। बहता है जब दुख गगरी सेभारी जीवन यह लगता हैताजे आँसू की गरमी सेलहू खौलने भी लगता हैतब लख शांत छवि तेरी अखंड़अपनी आँखों सबका आँसू मैंने पीना सीख लिया हैजीवन की मधुप्याली में अब अमृत भरना सीख लिया है।ऐसा लगता है जैसे मैंने कुछ जीना सीख लिया है … भूपेन्द्र कुमार दवे

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7 Comments

  1. Kiran kapur Gulati 04/08/2017
  2. Kiran kapur Gulati 04/08/2017
  3. babucm 04/08/2017
  4. Shishir "Madhukar" 04/08/2017
  5. Kajalsoni 04/08/2017
  6. डी. के. निवातिया 04/08/2017
  7. chandramohan kisku 04/08/2017

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