पत्ते के दोने पर

पत्ते के दोने पर सहसा नजर पड़ी नगर के चौक पर आवाक मन की पीड़ा बार बार कुरेद रही अंतर्मन झुलस गयारूह काँप गयी यह क्या देख रहापत्ते के दोने पर बसर करती एक अदना सी तर बतर जिंदगी lचन्द पत्तों का गठ्ठररस्सियों और बाँस के बल कंधो पर झूलता हर गली हर सड़क दुकानों पर दृष्टि लगाए होता नही हतप्रभ और उदास धूलधूसरित बदन मटमैला स्वेद सना वस्त्र नहीं कोई सिकन चेहरे पर lइरादों में कर्मठतासहजता आँखों मेंमन मे दीर्घ उत्कण्ठाउम्मीदों में कर्मफल नही कोई ऐश्वर्य सुख समृद्धि की कामना lजीवन चक्र चलता रहे नही कोई हसरत नाम पद प्रतिष्ठा की दो जून की रोटी हो मयस्सर सदा मान सम्मान से ये जीवन कटे द्वेष ईर्ष्या न हो कर्मपथ में कभी काम छोटा बड़ा कोई जग में नही llडॉ. छोटेलाल सिंह (प्रवक्ता)

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9 Comments

  1. babucm 02/08/2017
  2. raquimali 02/08/2017
  3. डी. के. निवातिया 02/08/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 02/08/2017
  5. Shishir "Madhukar" 02/08/2017
  6. madhu tiwari 02/08/2017
  7. ANU MAHESHWARI 03/08/2017

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