हर रोज़

 हर रोज़ वही धुँआ ,
हर रोज़ वही नफरत ,इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन ,अपनों को ही सही राह दिखाने को,घर वापसी की बाट जोहे ,प्रेम और सौहार्द से शांति लाने को ,अपने लाल खो चुकी उस माँ की  हर पुकार पर ,इस वादी ने अपनी बेबसी ही दिखाई है ,हर रोज़ कितनी चीखे यहां दफ़न होती है ,हर रोज़,इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन|

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

5 Comments

  1. babucm 01/08/2017
  2. Shishir "Madhukar" 01/08/2017
  3. डी. के. निवातिया 01/08/2017
  4. madhu tiwari 03/08/2017

Leave a Reply