हमराज़

गर लफ्ज़ मेरे गीत हैं तो, तुम शाइस्ता साज़ होऐ  हुस्न-ऐ-बेपरवाह, तेरा हुस्न उम्रदराज़ होकुछ ख्वाब मेरे ज़ेहन में अल्फ़ाज़ बन के हैं ढल रहेमेरे अनकहे इन नग्मों की तुम अनसुनी आवाज़ होबेसिमत मेरे वजूद को एक दायरे की तलाश थीआवारगी जहा थम गयी, तुम उस रहगुज़र का आगाज़ होहैं अजीब कश्मकश, तेरी सूरत-ऐ-बयानी भीकभी शोख मचलती हवाओ सी, कभी सुकून-ऐ-ढलती सांझ होमेरे  अक्श  का तू है आइना कोई भेद  जिससे छुपा नहींमेरी हस्ती जिसके वजूद से, मेरी हमसफ़र हमराज़ हो

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10 Comments

  1. babucm 27/07/2017
    • Dr. Nitin Kumar pandey 28/07/2017
  2. Raquim Ali 27/07/2017
    • Dr. Nitin Kumar pandey 28/07/2017
  3. डी. के. निवातिया 27/07/2017
    • Dr. Nitin Kumar pandey 28/07/2017
  4. Anjali yadav 28/07/2017
    • Dr. Nitin Kumar pandey 28/07/2017
  5. Shishir "Madhukar" 28/07/2017
    • Nitin 29/07/2017

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