साथ — डी के निवातिया

साथ

अक्सर जब टहलता हूँअकेले अकेले बांधे अपने दोनों हाथकभी उगते सूरज को निहारने की आस में सुबह सुबह,कभी सूनी सूनी मुझको घेरे रातबातो ही बातो में पूछ लिया एक दिन  मैंने अपनी ही परछाई सेक्यों चलती हो मेरे साथमुस्कराते हुए बड़े ही नरम लहजे में बोलीइस जमाने में कोई बाकी हो चलने वालामेरे सिवा तो बताना तेरे साथ।।

!!!डी के निवातिया

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 24/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017
  2. ANU MAHESHWARI 24/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017
  3. Anderyas 24/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017
  4. babucm 25/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017
  5. Bindeshwar Prasad sharma 26/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017
  6. raquimali 26/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017
  7. arun kumar jha 26/07/2017
    • डी. के. निवातिया 01/08/2017

Leave a Reply