प्रेम – डी के निवातिया

प्रेम कविता जिसका प्रदर्शन हो,वो प्रेम नहीं, नयनों से दर्शन हो, वो प्रेम नहीं !!!जो हम-तुम करते है,प्रेम वो नही,जो मन मे विचरते है, प्रेम वो नही !!!कलम के …

सोचा न था – डी के निवातिया

सोचा न था !सोचा न था एक रोज़ इस मोड़ से गुजरना पड़ेगा, जिंदगी को मौत से पल-पल खातिर लड़ना पड़ेगा,चलते-चलते लड़खड़ा जाएंगे पग कठिन राहो में फिर गिरते-गिरते …

रिश्ते – डी के निवातिया

रिश्ते *** *** रिश्ते वही मगर, रिश्तो में रिश्तो की वो बात नहीं है, सम्बन्ध वही, मगर सम्बन्धो में ज़ज्बात नहीं है, घर में बैठे, चार प्राणी अपनी गर्दन …

तू कैसा प्रेमी है – डी के निवातिया

तू कैसा प्रेमी है !! *** देता है न माँगता सोता न जागता न रोता न हँसता भागता न थकता देखता न तकता, बोलता न बकता, सभी को लगता …

कैसा ये सावन आया – डी के निवातिया

  कैसा ये सावन आया, मुझको अबकी ना भाया, बारिश की इन बूंदों ने जी भर मुझको तड़पाया ।। बागों में कोयल बोले, कानो में मिश्री घोले, अमवा की …

नहीं तो जाने क्या होगा किरण कपूर गुलाटी

नहीं तो जाने क्या होगा। kiran kapur gulati किरन कपूर गुलाटी पहचानें इक दूजे को हम, ऐसे होने इंसान चाहिए . मैं मेरे से उठ जाएँ ऊपर, कुछ ऐसे …

ग़ज़ल (जब तलक उनकी मुलाकात)

बह्र:- 2122 1122 1122 22 जब तलक उनकी करामात नहीं होती है, आफ़तों की यहाँ बरसात नहीं होती है। जिनकी बंदूकें चलें दूसरों के कंधों से, उनकी खुद लड़ने …

कैसे लिखूं मैं………………………देवेश दीक्षित

कैसे लिखूं मैं हास्य कविता सोचता बहुत हूं मैं पर बनती नहीं कविता क्योंकि गंभीर हूं मैं तभी लिखता हूं गंभीर कविता प्रयत्न करता हूं मैं कि लिखूं हास्य …

बहुत अच्छा लगता है……………….देवेश दीक्षित

दिल की अपनी सुनना सुनकर उस पर विचारना विचार कर लय में लाना बहुत अच्छा लगता है   शब्दों को फिर आगे चुनना चुनकर उसे पिरोना पिरोकर कागज पर …

 बहुत बुरा लगता है………………देवेश दीक्षित

बहुत बुरा लगता है जब कोई दिल तोड़ देता है लिखी हुई कविता पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है   बहुत बुरा लगता है जब होती अधूरी कविता …

सावन – डी के निवातिया

सावन *** *** *** सिंधु उर से उठ चले, भरकर अंजुरी जलधर, पवन वेग संग थे बढे, सलिल गागर उर धर !! असंतुलित आकार लिए गगन गाँव चले अंबुधर, …

नाकामी – शिशिर मधुकर

फूल वो सुख नहीं देता जिसकी खुशबू में खामी है तुम आगे बढ़ नहीं सकते अगर मन में गुलामी है भले कांटें अनेकों हैं महकते गुल की सोहबत में …

ग़ज़ल (बुझी आग फिर से जलाने लगे हैंं)

ग़ज़ल (बुझी आग फिर से जलाने लगे हैंं) बह्र :- 122*4 बुझी आग फिर से जलाने लगे हैं, वे फितरत पुरानी दिखाने लगे हैं। गुलों से नवाजा सदा जिनको …

पलायन

कहीं रात के सन्नाटे में, तो कहीं तपती दोपहरी में, मोहल्ले, कूचे, गलियों में, कुछ क़दमों ने शहर छोड़ा है। बस्तियों से दूर, बहुत दूर, उजड़ी, वीरान सड़कों पर, …

सरकारें – डी के निवातिया

सरकारें ! सरकारों में पंगे है या पंगो की सरकारें है सरकारों में गुंडे है या गुंडों की सरकारें है हकीकत से हमेशा मुहँ छुपाते है ये लोग, सरकारों …