माँ तेरा आँचल ढूंढता हूँ


माँ तेरा आँचल ढूंढता हूँ,
होता हूँ जब किसी उलझन में ।
अन्धकार में खो गया हूँ,
क्योंकि ढूँढ न पाया तेरा आँचल मैं ।

इतना फंस गया हूँ,
जिंदगी के कशमकश में ।
दुलार तेरा ढूंढ रहा हूँ,
ढूँढ रहा हूँ तुझे कण-कण में ।

एहसास दिलाता है मुझे,
तेरा सर पर हाथ फिराना ।
भले ही न हो साथ मेरे,
पर न भूल पाया, तुम्हारे प्यार का खजाना ।

होता जब बीमार मैं,
तुम्हारा पास में आकर बैठना ।
जब लगती चोट मुझे,
तेरा वो प्यार से डांटना ।

पहले लगता था बुरा मुझे,
अब महसूस तुम्हें सिर्फ करता ।
पहले लड़ता था तुमसे मैं,
अब रह गया तुम्हें सिर्फ याद करना ।

जाते वक्त भी न तुमको देख पाया मैं,
उस मनहूस घड़ी को मैं कोसता ।
लिपट कर तुम्हारे मृत शरीर से,
तुम्हारे आँचल को पकड़ता ।

कि शायद तुम वापस आ जाओ,
और प्यार से हाथ फेरकर मुझे पुकारो ।
पर न तो मैं तुम्हें रोक ही पाया,
और न थाम ही पाया तुम्हारे आँचल को ।

माँ तेरा आँचल ढूंढता हूँ,
होता हूँ जब किसी उलझन में ।
अन्धकार में खो गया हूँ,
क्योंकि ढूँढ न पाया तेरा आँचल मैं ।

देवेश दीक्षित
9582932268

गोदी

जब कभी,

आँख लगती थी मेरी,

मै,

सो जाती थी |

क्या पता,

क्या हो जाता था मुझे,

दिल-ही-दिल मे,

घबरा जाती थी |

 

आंसू,

बहते थे आँखों से,

तेरे पल्लू से,

पोछ  देती थी उसे |

 

गोदी,

मे सो जाती थी मै,

लोरी,

को सुनती थी मै |

 

तू मुझे,

कहानियां  सुनाती,

और मै खयालो मे खो जाती |

 

उस पल मे,

है इतना प्यार भरा,

कोई भी,

इसे चुरा न सका |

 

मीठे,

सपने बुनती थी मै,

उन लोरियों को,

ध्यान से सुनती थी मै |

 

तेरी गोदी,

मुझे याद आती है,

उसकी नर्मी,

मुझे याद आती है|

 

मुझे तेरी हर बात,

आज है समझ आई,

क्या पता क्यो मैने,

है तुझसे की लड़ाई |

 

छोटी-छोटी बातो पर,

होती थी नोक -झोक,

कुछ करना चाहूँ,

तो होती थी रोक-टोक |

 

चोट लगती थी,

तो तेरे नरम हाथ,

मुझे यह एहसास दिलाते थे,

कि तू थी मेरे साथ |

 

मुझे कोई अफसोस नही,

कि तू सुन नही सकती,

तेरी गोदी ने मुझे सिखाया,

कि हर माँ मे होती है ममता |

 

उसे है ईश्वर ने बनाया कुछ इस तरह,

कि अपने दिल मे किसी को भी दे दे वह जगह,

बस थोड़ा सम्मान और आदर है मांगती,

मेरी मां है सब कुछ जानती |

माँ बेटी की बाते

poems in hindi for girl baby

मेरा मन्न देख ने को तरसे ये संसार

मुझे भी माँ की गोद में खेलने का हक़ हे
मेरे भी कुछ  सपने हे जो में अपने

माँ और पिता जी के लिए पुरे करना चाहती हु
मुझे मारने से आप लोग तो किसी ना किसी दाग से बच जाओगे पर

क्या कभी अपने आप को माफ़ कर पाओगे
जब देखोगे कीसी की बच्ची को  किसी की गोद में तो में जरुर याद आउंगी
जब कोई बच्ची स्कुल जायेगी तो में याद आ ही  जाउंगी
जब किसी की बेटी अपनी माँ को माँ कह के बुलाएगी तो में जरुर याद आउंगी
फिर तुम पछताओगी कास में उसे नही मरती तो आज में भी किसी की माँ  होती

माँ तू   अपने आप को दोस मत देना तूने तो अच्छा   काम किया हे अपना फर्ज पूरा किया हे  पर में तुझे  कभी माफ़ ना कर पाउंगी
माँ जब कोई बेटी अपने माँ और पिता का नाम रोशन  करेगी तो में जरुर याद आउंगी
माँ अब आसू  पोछले   वरना में और मर जाउंगी  तेरी याद में
माँ माँ माँ मेरी माँ मेरी माँ

माँ की ममता

रोती हंसती सबकुछ करती,

दुःख कभी ना अपना बतलाती वो।

रात रात जगती खुद,

हमें सिरहाने सुलाती वो ।१।

 

खुद पी पी कर पानी,

निवाला हमें खिलाती वो,

गिले पे सोई रहती खुद,

सूखे पे हमें सुलाती वो ।२।

 

लाख गलतियाँ करते हम,

पर कभी खफा न होती वो,

हमारी एक किल्कारी पे,

दौड़ी दौड़ी आ जाती वो ।३।

 

माँ का प्यार ही,

मातृभूमि का एहसास है,

जो संतान भूल जाता है,

वो संतान नहीं, शैतान या है हैवान।४।

नज़्म – माँ

सर बहूत भारी सा लगता है।

 

माँ भी नही है पास

के जाके थोड़ी देर लेट जायूं

उनकी गोद में।

 

सफ़र के दिन सुबह

माँ की गोद में

सर रखके सोया था कुछ देर।

मेरे बालों को सहला रही थी।

कभी माथे पर कभी छाती पर

आपना हाथ फेर रही थी।

 

अचानक आँख खुल गयी।

 

मेरे माथे पर एक गरम अहसास,

एक बूँद आंसूं की

मेरी माँ की आँख से टपकी थी।

 

उस एक बूँद को

सर पे लिए

घर छोड़ के निकला था मैं।

 

और तबसे………

 

सर बहूत भारी सा लगता है।

सर बहूत भारी सा लगता है।

नारी तेरे कितने रूप

नारी तेरे कितने रूप,
कितना छाँव कहाँ तक धूप??
नारी तेरे कितने रूप|

कभी रूप माता का लेकर,
तुमने तन में प्राण दिया|
जीवन संभले, जीवन संवरे,
तुमने अमृत पान दिया|

कितने त्यागों, बलिदानों से,
पूरित है तेरा यह रूप?
नारी तेरे कितने रूप||१||

चंदा सी शीतलता तुझमे,
तू ही चंडी रूप है|
तुझमे भार्या, तुझमे पुत्री,
तुझमे मातृ स्वरुप है|

सूर्य प्रभा मण्डल सा चहुँदिशि,
जग में दमके तेरा रूप|
नारी तेरे कितने रूप||२||

– दीपक श्रीवास्तव

सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा

हे जननी, हे जन्मभूमि, शत-बार तुम्हारा वंदन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||

तेरी नदियों की कल-कल में सामवेद का मृदु स्वर है|
जहाँ ज्ञान की अविरल गंगा, वहीँ मातु तेरा वर है|
दे वरदान यही माँ, तुझ पर इस जीवन का पुष्प चढ़े|
तभी सफल हो मेरा जीवन, यह शरीर तो क्षण-भर है|
मस्तक पर शत बार धरुं मै, यह माटी तो चन्दन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||१||

क्षण-भंगुर यह देह मृत्तिका, क्या इसका अभिमान रहे|
रहे जगत में सदा अमर वे, जो तुझ पर बलिदान रहे|
सिंह-सपूतों की तू जननी, बहे रक्त में क्रांति जहाँ,
प्रेम, अहिंसा, त्याग-तपस्या से शोभित इन्सान रहे|
सदा विचारों की स्वतन्त्रता, जहाँ न कोई बंधन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||

–दीपक श्रीवास्तव

वन्दे मातरम् – राष्ट्र गीत

वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।।

शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।।

कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
के बॉले माँ तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।३।।

तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदय़े तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।।४।।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।५।।

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।६।।

 

- बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा संस्कृत बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत के पहले दो पैराग्राफ १८७६ (1876) में संस्कृत में लिखे।

फ़िल्मी गीत के तौर पर  हेमंत कुमार (आनंदमठ 1952) और लता मंगेशकर (आनंदमठ 1952) ने गाया

 

माँ

चूल्‍हे की आग में खुद को तपाती हुई
बच्चे की ग़लतियाँ ममता में भुला रही है
दूध रोटी से लेकर, मंदिर के घंटे तक
स्नेह की चाशनी में, बचपन घुला रही है
बारिश के मौसम में, अंदर से गीला होकर
बच्चे को बचाकर खुद को सिला रही है
बिगड़ ना जाए वो, कुछ ऐसा ही सोचे
उसे डाँटकर माँ खुद को रुला रही है
अंधेरा है आगे, कहीं डर ना जाए बच्चा
कतरा कतरा माँ खुद को जला रही है
बहुत खेल चुके, अब शाम हो गयी है
आ जाओ पास माँ तुम्हे बुला रही है

—सुलोचना वर्मा—

सुन न माँ , सुन रही है न माँ

तुम कहती हो मैं निर्मोही हूँ
अपनों की परवाह नहीं
अपनी धुन का राही हूँ |

कहनी है इक बात पर कह नहीं पाता
मन भावुक है, बहने वाली ज़ुबान नहीं
न जानू , क्या ! समझा पाऊं ?
बिल्व फल का हूँ जैसे बाहरी छाल |

बचपन में जैसा था अब भी वैसा हूँ
कुछ बदला तो काया
समझ सकूँ अनजानी राहें
वो सोच है बदली
मन से अब भी वही बाला हूँ |

मीलों दूर हूँ तुझसे
कहने को हैं इंसान बहुत
दिखते घर हज़ार
अकेला हर पल खुद को पाता हूँ |

मैं अपराधी हूँ
जो निर्मोही हूँ तेरा
बड़ा हो गया , लिहाज़ ना करना
न करना इंतज़ार
पड़ती थी जो झाड़ू की मार |

बहुत याद आती है तेरी,
अक्सर ख्यालों में खो जाता हूँ
खुद को तेरी छाया में पाता हूँ |

सुन न माँ , सुन रही है न माँ ………………………….

मां बाप

DSC02396-2

माँ बाप का तो क़र्ज़ अदा तुम्हे करना पडेगा

माँ बाप का तो क़र्ज़ अदा तुम्हे करना पडेगा
आज नहीं तो कल तुम्हे भी भरना पडेगा
माँ बाप….

कितने लाड प्यार से पाला ये कैसे जानोगे
दिया तुम्ही ने देश निकाला ये कैसे मानोगे
तिल-तिल तुम्हे भी एक दिन मरना पडेगा
माँ बाप….

माँ ने काटी रातें गीली सूखे में तुम्हे सुलाया
पिता ने भी दिन-रात बस तेरे लिए ही कमाया
पतझड़ की तरह एक दिन तुम्हें भी झड़ना पडेगा
माँ बाप….

इक पल का भी चैन नहीं जब तुझको मर्ज़ था
हाँ जो किया उन्होंने तेरे लिए ये उनका फ़र्ज़ था
इसी रास्ते से एक दिन तुझे गुजरना पडेगा
माँ बाप….

तेरी ख़ुशी में आँखें माँ नम कर लेती थी
आंसू ना गिरें जमीं पर आँचल भर लेती थी
इक दिन तुम्हे भी खुद से ही यूँ लड़ना पडेगा
माँ बाप….

चिड़िया चोंच में भर लाती है जैसे दाना
अब फ़र्ज़ समझ या मजबूरी तुझको है निभाना
सोच जरा नई फसल पर असर क्या वरना पडेगा
माँ बाप….

माँ बाप का तो क़र्ज़ अदा तुम्हे करना पडेगा
आज नहीं तो कल तुम्हे भी भरना पडेगा

_________________________________

गुरचरन मेह्ता 

याद माँ की…..

घुटनों के बल जब रिढ़ता था मैं
मेरी उंगली पकड़ मुझे चलना सिखाती थी – माँ
शायद कभी फांका भी किया हो
पर मुझे भरपेट खिलाती थी - माँ

मेरे चेहरे पर हमेशा आँचल ढक देती थी – माँ
मेरे सिरहाने के लिए
अपना बाजू रख देती थी – माँ

कभी जो रुला दिया मुझे पल भर को
तो अकेले घंटो रोती थी – माँ
जब तक मैं घर न पहुँच जाऊं
कभी नहीं सोती थी – माँ

जब भी बिजली गुल होती
तो  सारी रात पंखा झलती थी – माँ
मैं सोया रहूँ न जागूँ गहरी नींद से
इसलिए सोते सोते भी जगती थी – माँ

जब भी कोई रोग हो जाता तो
लाल मिर्चों का का छोंका लगाती
और नज़रें उतारती थी – माँ
रोग भी सचमुच हिरण हो जाता
बस कुछ इस तरह
पुचकारती थी – माँ

काली रातों से मैं जब डरता था तो
उजाला बन कर
मेरी आँखों में समां जाती थी – माँ
मेरी छोटी-छोटी शरारतों की बाते
करती थी पिताजी से हंस हंस कर
और मेरी बड़ी-बड़ी शरारतें
अक्सर छुपा जाती थी – माँ

पढ़ता था मैं रात में अक्सर
जागती थी माँ रात भर
पेपर मेरे होते थे पर
परीक्षा माँ की होती थी
बन सकूँ कुछ मैं
बस उसकी यही मनोती थी

“मुझे याद है:
एक माँ ने उन चारों भाइयों को अकेले ही पाला था
पर वे चारों मिलकर एक माँ को ना रख सके थे
चारों ने मिलकर उसे घर से बाहर निकाला था”

बेटे तो बहुत देखे हैं कपूत पर
माता, कुमाता, न देखा न सुना
धन- दौलत, प्यार- मोहब्बत
माँ को छोड़ इन सबको चुना
स्नेह से फिर भी माँ
सदा ही दुआएं देती है
उम्र के उस पड़ाव में
हम कहते हैं माँ को एक बला
पर वो सदा हमारी बलाएँ लेती है

बचें रहें हम दुष्प्रभावों से
इसके लिए माँ अक्सर पूजा करती थी
कहीं कभी कुछ हो ना जाए हमें
माँ हमेशा डरती थी

जब कभी मैं रूठ जाता यूँ ही झूठमूठ
तो माँ सचमुच उदास हो जाती थी
और जब मैं खुश होता तो वह ख़ुशी
माँ के लिए कुछ ख़ास हो जाती थी

पर अब नहीं है माँ तो उसे याद कर
मैं खुदको उसकी यादों कीगोद में सुला देता हूँ

और मेरी पत्नी को अपने बच्चों के लिए
वही सब करते देख
अक्सर मुस्कुरा देता हूँ.

_____________________________________

गुरचरन मेह्ता

मेरी अम्मा

mothers 1-01

मेरी नज़रों की पहली ख़ुशी तुम ही है अम्मा

मेरी पहली दुधिया मुस्कान तुमको देखके ही है अम्मा

 

तुम्हारी हाथ पकडके चलना सीखा है अम्मा

तुमने ही हाथ दिखाके दोड़ना सिखाया है अम्मा

 

शब्दों का पहचान भी तुम्हारी होंटों से ही है अम्मा

और वो पहली शब्द जो निकली मेरी जीब से वो तुम ही है अम्मा

 

हमरी गाँव की लावण्यता तुमने ही बताया है अम्मा

और ये पशु पक्षियों का पहचान भी तुमने ही किया है अम्मा

 

तुम्हारी पल्लू के कोने पकडके ही पहली कक्षा गयी है अम्मा

तुम्हारी धुअओ से आज इधर तक पहुंची है अम्मा

 

मेरी पहली दोस्ती और पहला प्यार तुम ही है अम्मा

सम्मान सहन शक्ति और क्षमा तुम से ही सीखी है अम्मा

 

संस्कार का सीख तुम से ही हुई है अम्मा

दुनिया की पहचान भी तुम्हारी आंखों से ही हुई है अम्मा

 

ये कविता जो लिखी है वो भी उसी प्यार की वजह से

मेरे जीवन का दीपक तुम ही है अम्मा

ममता का स्वरुप और मेरा संसार तुम ही है अम्मा

 

 

More »

मां वो शब्द है जिसमे कायनात समाई है

मां वो शब्द है जिसमे कायनात समाई है…

जिसकी कोख मे शुरु हुआ था जिन्दगी का सफर,
जिसकी गोद मे खोली थी आखें पहली बार,
जिसकी नजरो से ही दुनिया को देखा था, जाना था,
जिसकी उन्गलियां पकड कर चलना सीखा था पहली बार !!

उसी ने हमारी खुद से करायी थी पेह्चान,
दुनिया का समना करना भी उसी ने सिखाया,
जनम से ही दर्द से शुरु हुआ था रिश्ता हमारा,
शायद हर दर्द पे ईसीलिये निकलता है शब्द मां हर बार !!

मां की जिन्दगी होती है उसके बच्चे मे समायी,
पर बडे होते ही दूर हो जाती है राहे उसकी जिन्दगी की,
भुला देता है इस शब्द की एहमियत अपनी व्यस्तता मे कही,
फिर अचानक कही से सुनाई देती है आवाज मां,
आखें भर आती है बस धार धार !!

मां का कर्ज नही चुका सकता कभी कोई इस दुनिया मे,
भगवान से भी बडा है मां क दर्जा इस दुनिया मे,
ना होती वो तो ना बसता ये सन्सार कभी,
ना होगी वो तो भी खत्म हो जाएगा सन्सार ये सभी!!

कस्ती है इसलिये ‘मुस्कान’ जागो अब भी वक्त है,
ना करो शर्मसार अपनी जननी को, ना करो अत्याचार औरत के अस्तित्व पर,
न मारो बेटी के अन्श को यु हर बार.
नही तो इक दिन तरस जाएगा मां के एह्सास को ही ये सारा सन्सार !!

क्योकि मां वो शब्द है जिसमे कायनात समाई है…

9 May 2013

माँ तेरे हैं नाम अनेकों

माँ तेरे हैं नाम अनेकों,
कैसे तुम्हे पुकारे हम?
तुम जीवन का अमर स्रोत,
छोटे से हैं जल धारे हम।।

जीवन का निर्माण तुम्ही से,
तुमसे ही पलती सृष्टि।
सभी कष्ट मिट जाएँ माता,
जहाँ पड़े तेरी दृष्टि।
बहुत कष्ट सह कर आये हैं,
माता तेरे द्वारे हम।
तुम जीवन का अमर स्रोत,
छोटे से हैं जल धारे हम।।1।।

तुम ही बंधन, तुम ही मुक्ति,
तुमसे ही संसार सकल।
हर प्राणी का प्राण तुम्ही हो,
फिर क्यों है संसार विकल?
तुम कण कण में बसी हुई हो,
कैसे तुम्हे निहारे हम?
तुम जीवन का अमर स्रोत,
छोटे से हैं जल धारे हम।।2।।

ममता भरी छांव

कोख से जन्म दे, ये संसार दिखाया,

रातों भर जग, सुखे बिस्तर पर सुलाया

हर मोड पर कच्चे घडे की तरह,

हाथों का सहारा दे मजबूत बनना सिखाया

ममता भरी छाव में, हाथ थामे मेरा,

चलना सिखाया, पढना सिखाया

 टेढे-मेढे रास्तो की डगर से बचाकर,

जीवन के सफर में आगे बढना सिखाया

प्यार कर दुलार कर सच का पाठ पढाया

मुश्किलों से निपट, निडर बनना सिखाया

ममता भरी छाव में, हाथ थामे मेरा

चलना सिखाया, पढना सिखाया

पैरों पर खडा कर जूझना सिखाया

सिचिंत कर मेरी गृहस्थि, नया घरौदा बसाया

उतार सकती नही, हे मा तेरा ये कर्ज

चाहे क्यों न लें लू धरती पर हजारो जन्म

ममता भरी छाव में हाथ थामे मेरा

चलना सिखाया पढना सिखाया

माँ

दुर्गम पहाड़ों के परे अबाध झरनों के पार
बीहड़ जंगलों के आखिरी किनारे पर
अकेली रहती है जो स्त्री
वही शायद हम सब की माँ है

बहुत दफ़ा हम बहुत-सी चीज़ों को नहीं जानते
हम ये भी नहीं जानते माँएँ अपने बच्चों के लिए
क्यों प्रार्थनाएँ करती हैं
क्यों रखती हैं वे आए दिन व्रत उपवास मन्नतें माँगती हैं

निर्जन वन में बिल्कुल अकेले रहते हुए भी
कातती हैं दिन-रात वे हमारे लिए संस्कारों का सूत

ये कपड़े जो हम लोगों ने पहन रखे हैं
और जिन्हें पहन कर हम आज इतना इतरा रहे हैं
माँ के काते सूत से ही बने हैं
हमने अर्से से उसे नहीं देखा
सिर्फ़ उसके बनाए वस्त्र पहने हैं और उसकी दी हुई भाषा बोली है

सदियों से सोच रहे हैं हम
अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए
किसी दिन माँ से मिलने दुर्गम पहाड़ों से परे
अबाध झरनों के पार बीहड़ जंगल के आखिरी छोर तक जाएँ

तभी से सामने हैं
दो मामूली, किंतु अनुत्तरित सवाल-
अपने ‘होने’ की कृतज्ञता के लिए बोलें माँ से किन शब्दों में ?
उसके लिए आखिर कौन-सी चीज़ ले जाएँ ?

माँ

माँ मॆरी है

सब सॆ सुंदर

फूल सरीखी माँ

श्रद्धा त्याग

तपस्या की

मूरत मॆरी माँ

बाधाओं सॆ

कभी ना हारॆ

ऐसी मॆरी माँ

चंदन और

कुमकुम सी पावन

लगती मेरी माँ

पूजा की

घंटी सी बजती

हरदम मॆरी माँ

गीता वॆद पुराणों

में भी मिलती

मेरी माँ

नन्ही सी कली मेरा जीवन …………..बढ़कर नहीं कोई दूजा

नन्ही सी कली मेरा जीवन …………….
१. सबसे पहले माँ ने अपनाया
नौ महीने कोख में सुलवाया |

२. नव जीवन का अंकुर फूटा
माँ की आँखों अश्रु छूटा |

३. नव चेतन स्पर्श का एहसास आया
आप को पिता के हाथो में पाया |

४. माँ का आँचल, पिता का साया
सारा बचपन इसी में समाया |

६. जीवन भर करूँ मैं किनकी पूजा
माँ-बाप से बढकर नहीं कोई दूजा |

मां

मां सिर्फ़ शब्द नहीं

पूरी दुनिया पूरा संसार है मां

अंतरिक्ष के इस पार से

उस पार तक का अंतहीन विस्तार है मां।

मां सिर्फ़ शब्द नहीं——————–।

शिशु की हर तकलीफ़ों को रोके

ऐसी इक दीवार है मां

शब्दकोश में नहीं मिलेगा

वो कोमल अहसास है मां।

 मां सिर्फ़ शब्द नहीं——————-।

स्रिजनकर्ता सबकी है मां

प्रक्रिति का अनोखा उपहार है मां

ममता दया की प्रतिमूर्ति

ब्रह्म भी और नाद भी है मां।

मां सिर्फ़ शब्द नहीं———————।

स्वर लहरी की झंकार है मां

लहरों में भी प्रवाह है मां

बंशी की धुन है तो

रणचण्डी का अवतार भी है मां।

मां सिर्फ़ शब्द नहीं———————।

मां सिर्फ़ शब्द नहीं

पूरी दुनिया पूरा संसार है मां।

000000000000

पूनम

पिछले साठ बरसों से

पिछले साठ बरसों से
एक सुई और तागे के बीच
दबी हुई है माँ
हालाँकि वह खुद एक करघा है।
जिस पर साठ बरस बुने गए हैं
धीरे-धीरे तह पर तह
खूब मोटे और गझिन और खुरदुरे
साठ बरस
जब वह बहुत ज़्यादा थक जाती है
तो उठा लेती है सुई और तागा
मैंने देखा है कि सब सो जाते हैं
तो सुई चलाने वाले उसके हाथ
देर रात तक
समय को धीरे-धीरे सिलते हैं
जैसे वह मेरा फटा हुआ कुर्ता हो।

-केदारनाथ सिंह

ताँका

हरी दूब-सी
छाया बरगद-सी
सदा पावन
माँ कभी रामायण
और कभी गीता-सी।

नदी बनती
कभी बनती धूप
कभी बदली
माँ पावन गंगोत्री
जल से भी पतली।

ढल जाती है
घुल मिल जाती है
माँ तो माँ ही है
प्यार का खजाना है
वेदों ने बखाना है।

- डॉ. जगदीश व्योम

आदि से अंत तक

आदि से अंत तक
शून्य से ब्रह्म तक
ज़िन्दगी के प्रथम स्वप्न से हो
शुरू
आस की डोर में
सांझ में भोर में
तुम ही मेरी सखा, तुम ही मेरी
गुरू
तुम ही आराध्य हो
तुम सहज साध्य हो
प्रेरणा धड़कनों के सफ़र की
तुम्हीं
पथ संभाव्य में
मन के हर काव्य में
एक संकल्प लेकर बसी हो तुम्हीं
दर्द की तुम दवा
पूर्व की तुम हवा
चिलबिलाती हुई धूप छांह हो
सृष्टि आरंभ तुमसे
तुम्हीं पर ख़तम
बस तुम्हारा ही विस्तार सातों
गगन
एक तुम आरुणी
एक तुम वारुणी
एक तुम ही हवा एक तुम ही अगन
सृष्टि की तुम सृजक
प्यास को तुम चषक
मेरे अस्तित्व का तुम ही आधार हो
बिन तुम्हारे कभी
चंद्रमा न रवि
है अकल्पित कहीं कोई संसार हो
हर घड़ी, एक क्षण
एक विस्तार, तृण
जो भी है पास में तुमने हमको दिया
किंतु हम भूलते
दंभ में झूलते
साल में एक दिन याद तुमको किया
कैसी है ये सदी
कैसी है त्रासदी
भूल जाते हैं कारण हमारा है जो
हैं ऋणी अंत तक
प्राण के पंथ पर
सांस हर एक माता तुम्हारी ही हो

अम्मा

चिंतन दर्शन जीवन सर्जन
रूह नज़र पर छाई अम्मा
सारे घर का शोर शराबा
सूनापन तनहाई अम्मा

उसने खुद़ को खोकर मुझमें
एक नया आकार लिया है,
धरती अंबर आग हवा जल
जैसी ही सच्चाई अम्मा

सारे रिश्ते- जेठ दुपहरी
गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना दरिया झील समंदर
भीनी-सी पुरवाई अम्मा

घर में झीने रिश्ते मैंने
लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके चुपके कर देती थी
जाने कब तुरपाई अम्मा

बाबू जी गुज़रे, आपस में-
सब चीज़ें तक़सीम हुई तब-
मैं घर में सबसे छोटा था
मेरे हिस्से आई अम्मा

- आलोक श्रीवास्तव

कवितायें ई-मेल से प्राप्त करे
(Enter your email address)

Delivered by FeedBurner




Subscriber News Letters Here

Full Name
Email *
Choose whether to subscribe or unsubscribe *
Subscribe
Unsubscribe

Bus TimeTable
Powered By Indic IME