लहरा के कहता है तिरंगा – बाल कविता

लहरा के कहता है तिरंगा सब जवानों आज तो
तुम्हें बचाना है अपनी भारत माँ की लाज को

पी कर जिसके दूध को बने करमचंद से महात्मा
भगतसिंह सुभाष को जिसने ममता के रंग में रंगा
उसी गोद ने बनाया लाल-बाल-पाल के अंदाज़ को
लहरा के कहता है तिरंगा….

जिसके खेतों में लहलहाये नेहरु चाचा का गुमाँ
उस पावन धरती को कहें हम अपनी भारत माँ
यहाँ राम का धनुष प्रेम करे कृष्ण के साज़ को
लहरा के कहता है तिरंगा….

आओ खाएं कसम कि हिन्दू मुस्लिम भाई हैं
विज्ञान और संस्कार हमारी सच्ची कमाई है
कन्या वध से ना करेंगे गन्दा इसके ताज को
लहरा के कहता है तिरंगा….

भारत माँ को फिर सोने की चिड़िया बनायेंगे
मेहनत लगन से अपनी संस्कृति को बचायेंगे
कोई न रोक पायेगा हम बच्चों की आवाज़ को
लहरा के कहता है तिरंगा….

चिड़िया घर की रेल चली

चिड़ियाघरकीरेलचली

रेल चली भाई रेल चली,   चिड़िया घर की रेल चली ,

आगे बैठे बन्दर मामा ,पीछे उनकी दुल्हन जी ,

तीतर, मोर, पपीहा बैठे, इनको जाना दिल्ली जी,

शेर शेरनी सिग्नल देंवें , भागो रेल ना छूटे जी,

हाथी -हथिनी चाय पिलायें, और गरम पकोड़े जी,

ऊंट- ऊंटनी भागते आये ,हाए,उनको जाना जयपुर जी,

भालू दादा टिकिट भूल गए, छूटी उनकी रेल जी…..

रेल चली भाई रेल चली ..*****

पक्षिओं का मेला

आओ देखें पक्षिओं  का  मेला है,

छोटे बड़े रंग- बिरंगे पंखों का मेला है.

कांव-कांव करता कौआ आया सब का दादा,

पहन कर कोट काला बातें करे ज्यादा,

एक आँख से काना समझे बड़ा सयाना ,

लोमड़ी को देख कर भूल जाय रोटी खाना ,

चूं-चूं करती चिड़िया आयी सब की नानी,

मटकती -मटकती ओड़ चुनरिया धानी ,

इधर -उधर फुदकती रहती बनती बड़ी सयानी ,

खिचड़ी पका कर खा जाती फिर चिल्लाती रानी,

गुटर-गूं करता कबूतर आया बिना पूछं वाला,

पगड़ी सिर पर  बाँध कर कबूतरी साथ लाया,

बना घोंसला खिड़की पर बच्चों के संग आया,

बिल्ली को देख कर आँखों को दबाया ,

कवैक-कवैक करती आयी बतख दूर से शोर मचाती ,

पीली चोंच लाल पैर कीड़े खाती तैरती इठलाती ,

छोड़ कहीं न अपने बच्चे पीछे है भगाती,

मैं भी नाचूं मैं भी गाऊँ पहला नंबर है पाती,

ऊँचे-ऊँचे राजहंस चलते-चलते झुंडों  में आये ,

उड़ते-उड़ते सारस सफ़ेद रंगों में छाए,

ताज पहन कर मुर्गा बैठा तोते ने बजाया बाजा,

मछली चबाता बगुला आया ,मोर ने नाच नचाया ,

बड़ी बातूनी मैना आयी ,कोयल ने मीठी तान सुनाई ,

चिक-चिक चीक तीतर बटेर का कहना ,

दोनों लड़े आपस में सब को खूब सताना ,

कर दिया हंगामा खूब शोर मचाया,

कठफोड़वे ने चोंच मार कर सब को दौडाया ,

क्या हुआ क्या हुआ कोई समझ ना पाया,

कहाँ जाएँ सब का मन घबराया,

सब बोलें अपनी बोली इतना हो गया शोर ,

ख़तम हो गया मेला सब दौड़े घर की ओर.

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बचपन

मिट्टी के चूल्‍हे पर जलती
गीली लकड़ी की खुशबू
सांझ को तुलसी पर
जलता दिया बाती
शंख की ध्वनि और
माँ की संध्या आरती
मंदिर के घंटे का नाद
दादी का जलता अलाव
बड़ी माँ के माथे पर
कभी ना अस्त होता सूरज
उस छोटे काले कमरे में
खुशी खुशी रहने का धीरज
दस पैसे वाला
गुलाबी बर्फ का गोला
बुढ़िया के बाल और
नारियल लड्डू वाला
वो कंचे, वो गुलेल
धुआँ उड़ाती रेल
गाँव का बड़ा सा मेला
नाटक, जादूगरवाला
लड़खडाकार गिरने पर
कोई माथा चूम रहा है
ज़िंदगी बाईस्कोप सी है
बस रील की जगह
बचपन घूम रहा है

सुलोचना वर्मा

क्यों हैं तेरे इतने रूप

माँ कहती है तुम हो एक,
फिर क्यों तेरे रूप अनेक?
हम तुमको क्या कहें बताओ |
राम, कृष्ण या अल्ला नेक ||१||

कोई पूरब को मुंह करता,
कोई पश्चिम को ही धरता |
चाहे पूजा या नमाज हो,
ध्यान तुम्हारा ही तो करता ||२||

क्यों हैं तेरे इतने रूप?
दुनिया तो है अँधा कूप |
जात-धर्म की पग-पग हिंसा,
यही जगत का हुआ स्वरुप ||३||

माँ कहती सब तेरी माया,
अलग-अलग रखकर के काया |
जीवन का आदर्श बताया,
मूरख इन्सां समझ न पाया ||४||

क्यों हमको नजर न आते

क्यों तुम हो भगवान् कहाते?
धुन बंशी की मधुर बजाते।
माँ कहती कण-कण में बसते,
फिर क्यों हमको नजर न आते।।

सूरज दादा दिन में आते,
चन्द मामा रात सजाते।
दोनों हैं जगमग तुमसे ही,
लेकिन तुम क्यों नजर न आते।।

माखन रोज चुराकर खाते,
पर चोरी है बुरी बताते।
ये कैसी लीला है तेरी?
हम क्यों इतना समझ न पाते।।

अगर कभी इस जग में आते,
हमको भी तो दरश दिखाते।
माँ कहती तुम यहीं बसे हो,
फिर क्यों हमको नजर न आते।।

परी हूँ मै

 जस्बातों की गठरी सी बंधी

हर रिश्ते की आग्हाज हूँ मै

कुछ और नहीं बस एक लफ्ज है यारों

इस दुनिया का अंजाम हूँ मै

आसमा में जब देखो तो

बादलों का पानी हूँ मै

किसी से अनजानी नहीं बस

सबकी यादों से बेगानी हूँ मै

पर्वतों की ऊंचाई से

समंदर की गहराई हूँ मै

हर किसी के सोच से परे

सबकी उमीदों में समाई हूँ मै

इन्द्रधनुष की परछाई सी

रंगों से भरी हूँ मै

दुनिया के लिए बस हूँ एक लड़की

पर अपने माँ बाबा की परी हूँ मै

मैं मिलूंगा तुमसे

इसी जन्म में
मैं तुम से मिलूँगा किसी दिन

डाक में जैसे मिलती है चिट्ठी
हाथों से मिलते हैं दस्ताने
डायरी में मिल जाता है कोई पुराना पता
सड़क पर मिले किसी नोट
और भूलने के बहुत दिन बाद
अचानक याद आए एक फ़ोन नम्बर की तरह मैं तुम से मिलूँगा

पढ़ कर पहले दिन स्कूल से घर लौटे बच्चे की तरह या
सुखांत नाटकों के उपसंहार पर जैसे मिलते हैं बिछुड़े हुए लोग

मुझे भरोसा है
कभी न कभी परिचित किसी हस्तलेख
किसी स्वाद
किसी सुगन्ध
किसी ध्वनि
किसी अर्थ की तरह
अचानक किसी दिन मैं तुम से मिलूँगा।

हम बच्चे प्रात:उठ जाते

हम बच्चे प्रात:उठ जाते

ठण्डे पानी से, खूब नहाते,

नहा-धो नित ताजा हो जाते

घडियाली देख वर्दी पहनते,

स्कूल नियम-पालन से जाते

नास्ता भी झट से खाते ,

हम सबसे बोलें आते जाते

चले-चले-चले, हम चले नमस्ते,

करें नमस्ते , उठाएं बसते

हम चलते हैं स्कूल के रस्ते,

पढने से न हम घबराते

हंसी ख़ुशी पढने को जाते,

गुरु हमारे- हमें हंसते

नई-नई बातें सिखलाते,

रोज गुरु नया पाठ पढ़ते

उसी पाठ को हम दोहराते,

पढने में आनंद आ जाता

कवि सार जब गुरु समझाते,

सूर्य देव जी हँसते आते

सूर्य देव जी हँसते आते
हलके ताप से हमें जगाते,

गर्मी में गुस्सा दिखलाते
सर्दी में सब जन को सुहाते,

धरती तपती अंबर तपता
अग्नि देव का ताप न घटता,

पल-पल में दिन-रात बनाते
कर प्रकाश वो प्राण बढ़ाते,

प्रात:काल पूरब से आते
सांय काल पश्चिम को जाते,

उर्जा का वह स्रोत है भारी
सभी गृहों का पालन हारी,

नन्हे मुन्हे बच्चे हैं

नन्हे मुन्हे बच्चे हैं

हम देश के सच्चे बच्चे हैं,

मर-मिट जाएँ देश की खातिर

साहसी वीर हम अच्छे हैं,

मात-पिता की आँख के तारे

नटखट प्यारे-प्यारे हैं,

मुस्काते हम फूल के जैसे

आँगन छवि सहारे हैं,

निराला-बचपन

बचपन तो होता है निराला

निश्छल, निर्मल,मस्ती वाला

दुनिया से उसको क्या मतलब

वो तो खुद ही भोला- भाला ।

मां की गोदी में लोरी

सुन कर वह तो सो जाता

बातें करता परियों के संग

सपनों में वो मतवाला ।

ना कोई चिंता,ना ही फ़िकर

मस्ती में बीते हर पल

चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान

देख के हंस दे रोने वाला।

बचपन सबके संग में खेले

ऊँच नीच की बात न मन में

सबके दिल को प्यार से जीते

वो तो है मन मोहने वाला।

वो धमा चौकड़ी,वो लड़ी पतंग

वो ब्याह रचाना गुड़िया का गुड्डे के संग

वो पूड़ी हलवा मेवे वाला

सच में वो बचपन अलबेला।

कुछ खट्टा कुछ मीठा बचपन

होता कुछ कुछ तीखा भी बचपन

भूले से भी ना भूलने वाला

यादों में हरदम बसने वाला।

काश ये बचपन हरदम रहता

दुनिया का उसपर रंग ना चढता

कोई अगर मुझसे पूछे तो

माँग लूँ दिन फ़िर बचपन वाला।

000

पूनम श्रीवास्तव

अक्की बक्की

अक्की बक्की करें तरक्की
तेरी मेरी दोस्ती पक्की ,

हम दोनों हैं,कितने लक्की
दोनों मिलकर,करें तरक्की ,

गेंहूं पीस रही है चक्की
अच्छी लगे न पूरी कच्ची ,

माँ के हाथ रसोई है सच्ची
साग-से खाएं,रोटी-घी-मक्की ,

मम्मी-पापा को,हम दें पप्पी
यारों को दें,यारी की झप्पी ,

नाम है अपना,अक्की बक्की
पढ़ लिख कर,हम करें तरक्की ,

मेरा भारत प्यारा

फूल-फूल पर लिखा मिलेगा
मेरा भारत मुझको प्यारा.

कण-कण को जयघोष सुनाती
खिली हुई है हर फुलवारी
वीरों की यह पावन धरती
सबके लिए बनी हितकारी
तुम चाहो, सौरभ ले जाओ
दे दूँ मैं गुलदस्ता न्यारा.

यहाँ हवाएं घर-आँगन में
दिन भर आती-जाती रहतीं
आने वाले मेहमानों को
मीठा गीत सुनाती रहतीं
जाने वाला कह कर जाता
मैं लौटूंगा फिर दोबारा.

हंसी-ख़ुशी की हरियाली है
अमन-चैन की धूप सुहानी
हर मौसम में प्यार घुला है,
चिड़ियाँ कहतीं प्रेम की बानी.
सुनने वालों की आँखों में
झूला झूले गगन हमारा.

सात सुरों के लगते मेले
नित्य यहाँ पर साँझ-सवेरे
अगला जन्म यहीं प्रभु देना
यदि फिर हों जीवन के फेरे.
दो मीठे बोलों में बसता
अपना देश-प्रेम का नारा.

-सुधीर सक्सेना ‘सुधि’

सैर सपाटा

कलकत्ते से दमदम आए
बाबू जी के हमदम आए
हम वर्षा में झमझम आए
बर्फी, पेड़े, चमचम लाए।

खाते पीते पहुँचे पटना
पूछो मत पटना की घटना
पथ पर गुब्बारे का फटना
तांगे से बेलाग उलटना।

पटना से हम पहुँचे राँची
राँची में मन मीरा नाची
सबने अपनी किस्मत जाँची
देश-देश की पोथी बाँची।

राँची से आए हम टाटा
सौ-सौ मन का लो काटा
मिला नहीं जब चावल आटा
भूल गए हम सैर सपाटा !

गीतों में मेरे डूबो तो

मेरे अंतस में मत झाँको
आँख तुम्हारी नम होगी
गीतों में मेरे डूबो तो
पीड़ाएँ कुछ कम होंगी ।

जीवन तो मृगतृष्णाओं के
जंगल जैसा है
जैसा तुमने सोचा समझा
जीवन वैसा है
एक चढ़ाई पार करो बस
धरती आगे सम होगी ।

अंतहीन ऊर्जा बिखरी
जो मुझे दीखती है
गिर-गिरकर फिर-फिर मत चढ़ना
उम्मीद सीखती है
लक्ष्य बना कर नहीं चले तो
सोच तुम्हारी भ्रम होगी ।

नदिया पर्वत काट-काट कर
आगे बढ़ा करे
अपनी ऊँचाई सिर लादे
पर्वत डरे-डरे
साथ-साथ चलने की इच्छा
जीवन का अनुक्रम होगी ।

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो।

बीती रात कमल-दल फूले,
उनके ऊपर भौंरे झूले।

चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर,
बहने लगी हवा अति सुदर।

नभ में न्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।

भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।

ऐसा सुंदर समय न खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

चंदा मामा

चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।

मैं तैरा मृग-छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।
उसकी उछल-कूद देखूँगा,
उसको चाटूँगा-चूमूँगा।

एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?

देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।

एक तिनका

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,
एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पॉंवों भागने लगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिए।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

चन्दा मामा दूर के

चन्दा मामा दूर के
छिप-छिप कर खाते हैं हमसे
लड्डू मोती चूर के

लम्बी-मोटी मूँछें ऐंठे
सोने की कुर्सी पर बैठे
धूल-धूसरित लगते उनको
हम बच्चे मज़दूर के
चन्दा मामा दूर के।

बातें करते लम्बी-चौड़ी
कभी न देते फूटी कौड़ी
डाँट पिलाते रहते अक्सर
हमको बिना कसूर के
चन्दा मामा दूर के।

मोटा पेट सेठ का बाना
खा जाते हम सबका खाना
फुटपाथों पर हमें सुलाकर
तकते रहते घूर के
चन्दा मामा दूर के।

कौन?

किसने बटन हमारे कुतरे?
किसने स्‍याही को बिखराया?
कौन चट कर गया दुबक कर
घर-भर में अनाज बिखराया?

दोना खाली रखा रह गया
कौन ले गया उठा मिठाई?
दो टुकड़े तसवीर हो गई
किसने रस्‍सी काट बहाई?

कभी कुतर जाता है चप्‍प्ल
कभी कुतर जूता है जाता,
कभी खलीता पर बन आती
अनजाने पैसा गिर जाता

किसने जिल्‍द काट डाली है?
बिखर गए पोथी के पन्‍ने।
रोज़ टाँगता धो-धोकर मैं
कौन उठा ले जाता छन्‍ने?

कुतर-कुतर कर कागज़ सारे
रद्दी से घर को भर जाता।
कौन कबाड़ी है जो कूड़ा
दुनिया भर का घर भर जाता?

कौन रात भर गड़बड़ करता?
हमें नहीं देता है सोने,
खुर-खुर करता इधर-उधर है
ढूँढा करता छिप-छिप कोने?

रोज़ रात-भर जगता रहता
खुर-खुर इधर-उधर है धाता
बच्‍चों उसका नाम बताओ
कौन शरारत यह कर जाता?

कबूतर

कबूतर
भोले-भाले बहुत कबूतर
मैंने पाले बहुत कबूतर
ढंग ढंग के बहुत कबूतर
रंग रंग के बहुत कबूतर
कुछ उजले कुछ लाल कबूतर
चलते छम छम चाल कबूतर
कुछ नीले बैंजनी कबूतर
पहने हैं पैंजनी कबूतर
करते मुझको प्यार कबूतर
करते बड़ा दुलार कबूतर
आ उंगली पर झूम कबूतर
लेते हैं मुंह चूम कबूतर
रखते रेशम बाल कबूतर
चलते रुनझुन चाल कबूतर
गुटर गुटर गूँ बोल कबूतर
देते मिश्री घोल कबूतर।

एक किरण आई छाई

एक किरण आई छाई,
दुनिया में ज्योति निराली
रंगी सुनहरे रंग में
पत्ती-पत्ती डाली डाली

एक किरण आई लाई,
पूरब में सुखद सवेरा
हुई दिशाएं लाल
लाल हो गया धरा का घेरा

एक किरण आई हंस-हंसकर
फूल लगे मुस्काने
बही सुंगंधित पवन
गा रहे भौरें मीठे गाने

एक किरण बन तुम भी
फैला दो दुनिया में जीवन
चमक उठे सुन्दर प्रकाश से
इस धरती का कण कण

हुआ सवेरा

हुआ सवेरा, गया अँधेरा,
सूरज रहा निकल
हाँ भई फक्कड़, लाल बुझक्कड़,
तू भी ढंग बदल ।

बुरे काम तज, राम राम भज,
मत रट मरा-मरा
अपने-अपने, देख न सपने,
मन रख हरा-भरा ।

अगर-मगर में, उलझ डगर में,
क्यों तू अड़ा-खड़ा
मस्त उछलता, रह तू चलता,
नाम कमा तगड़ा ।

है बेमानी, सनक पुरानी,
उसको दूर भगा
नई कहानी, सुना जबानी,
पिछले गीत न गा ।

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