बचपन

वो बचपन याद आता है
तितलियो के पीछे भागना
पकड़कर डब्बे में बंद करना
और उन संग खेलना फिर
खुले आसमा में छोड़ देना
वो बचपन याद आता है …….!!

आसमां को छूती पतंग
अचानक उस का कटना
दोस्तों संग उस पर टूटना
पाने की जद्दोजहद में
आपस में लड़ना-झगड़ना,
एक एक टुकड़ा हाथ में लिए
सबका एक साथ हँसना
वो बचपन याद आता है …….!!

वानर टोली बनाकर खेलना
रेल के डिब्बे जोड़कर चलना
दबे पैर घर से निकलकर
दुपहरी में क्रिकेट खेलना
शाम को घर-आँगन में घूमना
फागुन की चांदनी रात में
जुगनुओं का पीछा करना
वो बचपन याद आता है …….!!

वो बारिश में नहाते ओले चुनना
कागज की कश्ती पानी में ठेलना
दोस्तों संग गुल्ली डंडे का खेल
फिर बागो से कच्चे आम तोडना
माली का डंडा लेकर पीछा करना
हाथ न आकर उसको चिढ़ाना
वो बचपन याद आता है …….!!

खुले आसमान में सुबह की सैर
जुते खेतो में कब्बड्डी खेलना
ज्येष्ठ की तपती गर्मी में
नदी में ऊंचाई से कूदना
उलटे पैरो से उसमे तैरना
वो बचपन याद आता है …….!!

बिना किसी कारण के रूठना
आंसुओं से रोने का नाटक
भैया की फटकार का डर
दीदी का प्यार से सहलाना
झट से खिलखिलाकर हसना
वो बचपन याद आता है …….!!

आसमां को छूने की ताकत
हवा से तेज़ रफ़्तार
तूफानों से टकराने की इच्छा
वक़्त से आगे दौड़ने की तमन्ना
वो लहरो पे चलने के सपने
पंछियों संग उड़ने के अरमान
वो बचपन याद आता है …….!!

किताबो से ठसाठस भर बस्ता
पीठ पे लादे पैदल स्कूल जाना
गर्मी में पसीने में नहाया बदन
फिर भी मस्ती में हसते-२ आना
बेख़ौफ़ जीने की आजादी
वो बचपन याद आता है …….!!

दिन भर की उछल कूद
रात में थक कर सोना
माँ का गुस्से से बिगड़ना
पापा की डांट से डरना
माँ का आँचल में छुपाना
वो बचपन याद आता है…….!!

दादा जी का मेला दिखाना
दादी जी की गोद में लोरी सुनना
नाना जी का मिठाई दिलाना
नानी जी का कहानी सुनना
वो बचपन याद आता है…….!!
वो बचपन याद आता है…….!!

कल का भारत भाग्य विधाता

कल का भारत भाग्य-विधाता

छप-छप करता पानी में
नन्हा गोलू स्कूल है जाता,
एक हाथ से बस्ता थामे
और दूसरे हाथ से छाता।

छोटे-छोटे कदम हैं उसके
छोटे हैं जूते,
सफेद छोटी कमीज है उसकी
ब्लू पैंट भी हैं छोटे।

छोटे-छोटे टुकडों में
विद्या-ज्ञान वह पाता,
ऐसे स्कूल आता और जाता
कल का भारत भाग्य-विधाता।

संतोष कुमार “मुरारी”
राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता।

जंगल में मंगल

जंगल में मंगल
आओ मिलकर जंगल बनाएं
जंगल में रास्ते बनाएं
एक किनारे नदी बहाएं
हरे छोटे ऊँचे पेड़ लगाएं
पेड़ के पीछे पहाड़ बनाएं
पहाड़ के पीछे सूरज चमकाएं
पहाड़ों से झरने गिराएं
पहाड़ों में गुफा बनाएं
जंगल में जानवरों का खेल रचाएं
जंगल में मंगल मनाएं |

एक शेर ज़ोर से दहाड़ता आया
गुफा में अपना आसन जमाया
सभी जानवरों को वहां बुलाया
जानवरों का मन घबराया
शेर की सभा का पता लगाया |

हाथी सूंड हिलाता आया
घोड़ा हिनहिनाता आया
दरियाई घोड़ा गड़गड़ाता आया
बाघ गुरगुर्राता आया
गैंडा फुनफुनाता आया
भेड़िया चीखता आया
ज़ीब्रा सिंहनाद करता आया
गोरिल्ला गुरगुर्राता आया
खरगोश किकियाते हुए आया
चूहा चरचराते आया
बंदर खोंखों करते आया
सूअर गुरगुर्राता आया
कंगारू धीरे धीरे आया
हिरन लम्बी छलांग लगाता आया
बड़ा निराला जानवर जिराफ आया
जंगल सुन्दर लगने लगा |

शेर निडर और शक्तिशाली है
राजा बनना उसका अधिकार है
शेर ने सब का अभिनंदन किया
सब को बैठने का इशारा किया |

विशालकाय हाथी, सबसे सयाना
बड़े बड़े पैर, लम्बी सूँड,बड़े कानवाला
छोटी छोटी आंखे, मोटे दांतोवाला
चिंघाड़ा और सारा जंगल गूंजने लगा |

हाथी ने शेर को नमस्कार किया
फिर सब को सम्बोधित किया
शेर को सब नमस्कार करो
सब अभिनंदन करो
उस की आज्ञा मानना अनिवार्य है
सबने शेर के आगे सिर झुकाया
शेर ने सब को अपनी बुद्धिमता के बारे में
कुछ न कुछ सुनाने के लिये कहा |
मुर्गा फटाफट उठ गया
और बांग लगाने लगा
कुकडूं कुकडूं करने लगा

कौवा काँव काँव करने लगा
घड़े से पानी कैसे पिया
अपनी होशियारी बताने लगा |

हाथी नदी में पानी उछालने लगा
खुशी से चिंघाड़ने लगा
अपनी सूंड हिलाने लगा
वह दर्ज़ी की बात सुनाने लगा
दरियाई घोड़ा गड़गड़ाने लगा
भेड़िया चीखने लगा
बाघ गुर्राने लगा
गैंडा फुनफुनाने लगा
वालरस कराहने लगा
चूहा बिल से चरचराते आया
शेर को बंधन से कैसे छुड़ाया
झेंपते हुए घटना बता पाया

चूहे ने एक और बात सुनाई
उसने बिल्ली के गले में घंटी लगाई
बाकी चूहों की जान बचाई
चूहा इतराने लगा
मेंढक टरटराने लगा
गोरिल्ला गुरगुराने लग
बड़े चालाक और चतुर खरगोश ने
हिचकिचाते हुए माफ़ी मांगते हुए
धीरे से वह किस्सा सुनाया
शेर को कैसे एक कुएं में
उसकी परछायी दिखाकर बेवकूफ बनाया
सूअर चिचियाने लगा
हिरन लम्बी छलांग लगाने लगा |
ज़ीब्रा सिंहनाद करने लगा |

खरगोश ने गजराज को नदी में चाँद दिखाया
अपने साथियों को मरने से बचाया
सब ने ठहाका लगाया
और सब को उतावला बनाया
भयानक कुत्ता भोंकने लगा
वाघ चोकन्ना होने लगा

बंदर ने पेड़ से छ्लांग लगाई
उस ने मगरमच्छ की चालाकी सुनायी
और अपनी जान कैसे बचायी
मगरमच्छ घुरघुराने लगा
रीछ गुरगुराने लगा
घोड़ा हिनहिनाने लगा

बंदर ने वह घटना सुनाई
कैसे दो बिल्लीयों की सारी रोटी खाई
गधा रेंगने लगा
जिराफ लम्बी गर्दन गूंगा और बहरा
मिमियाने लगा पत्तियाँ खाने लगा |
कछुआ धीरे-धीरे चलता आया
उस ने खरगोश को था हराया
दौड़ का सारा हाल सुनाया
कंगारू धीरे धीरे हंसने लगा
गीध चीखने लगा |

लोमड़ी छोटे पाँव,लम्बी दुम,छोटी आँख
चालाक मन की खोटी आगे आई
अपनी चतुरता की बात सुनाई
कौवे को कैसे मूर्ख बना आई

ऊँचा ऊँट रेत पर भागने लगा |

भालू स्वार्थी दोस्त की कहानी सुनाने लगा |
सीधा सादा भोला भाला
गधा अपना गीत गाने लगा
अपने शरीर से धूल झाड़ने लगा
कुएं में से कैसे बाहर निकला
बयान करने लगा
सियार भयानक आवाज करने लगा
मेंढक टर्राने लगा |
कस्तूरी मृग बिना सींग वाला
लम्बी छ्लांग लगाने लगा
अकेला ही बैठने लगा |

बारहसिंगों वाला अभिमानी हिरण
झाड़ियों में फंसने की बात बताने लगा
बड़ा सुस्त भालू नाचने लगा
चीता बड़ा फुर्तीला तेज़ छलांग लगाने लगा
पेड़ के नीचे घुरघुराने लगा

बड़े लम्बे कान वाला खच्चर
पहाड़ों पर सामान ढोने लगा |

पीली धारीदार वाला वाघ गुरगुराने लगा
वाघ बचाओ का नारा लगाने लगा
शेर बड़ा खुश होने लगा
सब को बँधाईयां देने लगा
सब को शुभकामनाएं देने लगा
सब ने शेर का धन्यवाद किया |
शाम सुहानी होने लगी
सुखद हवा चलने लगी,
पेड़ों के पत्ते झूलने लगे
कोई मधुर, कठोर,कोमल
बेसुरी आवाज़ में राग अलापने लगे
आज़ादी अधिकार हमारा गाने लगे
जंगल कितना सुन्दर हमारा
है दिखता सब से न्यारा
हम को है अति प्यारा
सब जानवर नाचते ,गाते
फिर मिलने का वादा करते
अपने स्थान को गये भागते ||
जंगल में मंगल प्रसिद्ध हो गया…………..

पुनःनिर्माण

पुनःनिर्माण
हरा-भरा पेड़ देखा
चिड़ियों का जोड़ा देखा
कभी फुदकते इधर
कभी चहकते उधर
तिनका-तिनका लेकर आते
छोटासा घोंसला बनाते
चूँ-चूँ करके आवाज़ लगाते
बारी-बारी से घर बनाते
वहां हुए उनके अंडे चार
अण्डों में था उनका प्यार
अंडे फूटे बच्चे निकले
चीं-चीं करते चोंच हिलाते
चिड़िया दाना लेकर आती
बच्चों के मुँह में डालती
एक दुःखद बात हुई
ज़ोरो की हवा चली
ज़ोर का झोंका आया
पेड़ को हिला दिया
बच्चों का शोर हुआ
चिड़ा भी घबरा गया
हवा से घोंसला बिखर गया
चिड़ा का मन तड़प उठा
घोंसला, बच्चे कहाँ गए
दोनो न निराश हुए
उन्होंने न हिम्मत हारी
नव निर्माण की बात विचारी
तिनका-तिनका फिर जुटाया
दोनो ने पुनः घोंसला बनाया
जो होते नहीं निराश
सफलता रहती उनके पास……

Sender :
Mobile no. 9820281021
Email:toshigulati@rediffmail.com

नया ज्ञान

नया ज्ञान

छुट्टियां बीत गईं रातों की नींद गईं
उठा आलस छोड़ा स्कूल की ओर दौड़ा
इमारत वही प्रिन्सिपल वही
घड़ी वही घण्टी वही
कमरे वही कुर्सियां वही
शिक्षिका वही चपरासी वही
पर कमीज़ नयी पैन्ट नयी
बैग नया जूता नया
पुस्तकें नयी कापियां नयी
इतिहास नया गुजरा ज़माना
नेहरू का जाना मोदी का आना
गरमीका जाना बरखा का आना
दो का जोड़ पुराना
न बदल सका ज़माना
कुछ नया ज्ञान पाना
बस यही दुनिया को दिखलाना…………

प्रेषिका,
संतोष गुलाटी,
Mobile no. 9820281021

नया ज्ञान

पुनःनिर्माण

पुनःनिर्माण

पुनःनिर्माण

पुनःनिर्माण

लहरा के कहता है तिरंगा – बाल कविता

लहरा के कहता है तिरंगा सब जवानों आज तो
तुम्हें बचाना है अपनी भारत माँ की लाज को

पी कर जिसके दूध को बने करमचंद से महात्मा
भगतसिंह सुभाष को जिसने ममता के रंग में रंगा
उसी गोद ने बनाया लाल-बाल-पाल के अंदाज़ को
लहरा के कहता है तिरंगा….

जिसके खेतों में लहलहाये नेहरु चाचा का गुमाँ
उस पावन धरती को कहें हम अपनी भारत माँ
यहाँ राम का धनुष प्रेम करे कृष्ण के साज़ को
लहरा के कहता है तिरंगा….

आओ खाएं कसम कि हिन्दू मुस्लिम भाई हैं
विज्ञान और संस्कार हमारी सच्ची कमाई है
कन्या वध से ना करेंगे गन्दा इसके ताज को
लहरा के कहता है तिरंगा….

भारत माँ को फिर सोने की चिड़िया बनायेंगे
मेहनत लगन से अपनी संस्कृति को बचायेंगे
कोई न रोक पायेगा हम बच्चों की आवाज़ को
लहरा के कहता है तिरंगा….

चिड़िया घर की रेल चली

चिड़ियाघरकीरेलचली

रेल चली भाई रेल चली,   चिड़िया घर की रेल चली ,

आगे बैठे बन्दर मामा ,पीछे उनकी दुल्हन जी ,

तीतर, मोर, पपीहा बैठे, इनको जाना दिल्ली जी,

शेर शेरनी सिग्नल देंवें , भागो रेल ना छूटे जी,

हाथी -हथिनी चाय पिलायें, और गरम पकोड़े जी,

ऊंट- ऊंटनी भागते आये ,हाए,उनको जाना जयपुर जी,

भालू दादा टिकिट भूल गए, छूटी उनकी रेल जी…..

रेल चली भाई रेल चली ..*****

पक्षिओं का मेला

आओ देखें पक्षिओं  का  मेला है,

छोटे बड़े रंग- बिरंगे पंखों का मेला है.

कांव-कांव करता कौआ आया सब का दादा,

पहन कर कोट काला बातें करे ज्यादा,

एक आँख से काना समझे बड़ा सयाना ,

लोमड़ी को देख कर भूल जाय रोटी खाना ,

चूं-चूं करती चिड़िया आयी सब की नानी,

मटकती -मटकती ओड़ चुनरिया धानी ,

इधर -उधर फुदकती रहती बनती बड़ी सयानी ,

खिचड़ी पका कर खा जाती फिर चिल्लाती रानी,

गुटर-गूं करता कबूतर आया बिना पूछं वाला,

पगड़ी सिर पर  बाँध कर कबूतरी साथ लाया,

बना घोंसला खिड़की पर बच्चों के संग आया,

बिल्ली को देख कर आँखों को दबाया ,

कवैक-कवैक करती आयी बतख दूर से शोर मचाती ,

पीली चोंच लाल पैर कीड़े खाती तैरती इठलाती ,

छोड़ कहीं न अपने बच्चे पीछे है भगाती,

मैं भी नाचूं मैं भी गाऊँ पहला नंबर है पाती,

ऊँचे-ऊँचे राजहंस चलते-चलते झुंडों  में आये ,

उड़ते-उड़ते सारस सफ़ेद रंगों में छाए,

ताज पहन कर मुर्गा बैठा तोते ने बजाया बाजा,

मछली चबाता बगुला आया ,मोर ने नाच नचाया ,

बड़ी बातूनी मैना आयी ,कोयल ने मीठी तान सुनाई ,

चिक-चिक चीक तीतर बटेर का कहना ,

दोनों लड़े आपस में सब को खूब सताना ,

कर दिया हंगामा खूब शोर मचाया,

कठफोड़वे ने चोंच मार कर सब को दौडाया ,

क्या हुआ क्या हुआ कोई समझ ना पाया,

कहाँ जाएँ सब का मन घबराया,

सब बोलें अपनी बोली इतना हो गया शोर ,

ख़तम हो गया मेला सब दौड़े घर की ओर.

—————————————————————

 

 

बचपन

मिट्टी के चूल्‍हे पर जलती
गीली लकड़ी की खुशबू
सांझ को तुलसी पर
जलता दिया बाती
शंख की ध्वनि और
माँ की संध्या आरती
मंदिर के घंटे का नाद
दादी का जलता अलाव
बड़ी माँ के माथे पर
कभी ना अस्त होता सूरज
उस छोटे काले कमरे में
खुशी खुशी रहने का धीरज
दस पैसे वाला
गुलाबी बर्फ का गोला
बुढ़िया के बाल और
नारियल लड्डू वाला
वो कंचे, वो गुलेल
धुआँ उड़ाती रेल
गाँव का बड़ा सा मेला
नाटक, जादूगरवाला
लड़खडाकार गिरने पर
कोई माथा चूम रहा है
ज़िंदगी बाईस्कोप सी है
बस रील की जगह
बचपन घूम रहा है

सुलोचना वर्मा

क्यों हैं तेरे इतने रूप

माँ कहती है तुम हो एक,
फिर क्यों तेरे रूप अनेक?
हम तुमको क्या कहें बताओ |
राम, कृष्ण या अल्ला नेक ||१||

कोई पूरब को मुंह करता,
कोई पश्चिम को ही धरता |
चाहे पूजा या नमाज हो,
ध्यान तुम्हारा ही तो करता ||२||

क्यों हैं तेरे इतने रूप?
दुनिया तो है अँधा कूप |
जात-धर्म की पग-पग हिंसा,
यही जगत का हुआ स्वरुप ||३||

माँ कहती सब तेरी माया,
अलग-अलग रखकर के काया |
जीवन का आदर्श बताया,
मूरख इन्सां समझ न पाया ||४||

क्यों हमको नजर न आते

क्यों तुम हो भगवान् कहाते?
धुन बंशी की मधुर बजाते।
माँ कहती कण-कण में बसते,
फिर क्यों हमको नजर न आते।।

सूरज दादा दिन में आते,
चन्द मामा रात सजाते।
दोनों हैं जगमग तुमसे ही,
लेकिन तुम क्यों नजर न आते।।

माखन रोज चुराकर खाते,
पर चोरी है बुरी बताते।
ये कैसी लीला है तेरी?
हम क्यों इतना समझ न पाते।।

अगर कभी इस जग में आते,
हमको भी तो दरश दिखाते।
माँ कहती तुम यहीं बसे हो,
फिर क्यों हमको नजर न आते।।

परी हूँ मै

 जस्बातों की गठरी सी बंधी

हर रिश्ते की आग्हाज हूँ मै

कुछ और नहीं बस एक लफ्ज है यारों

इस दुनिया का अंजाम हूँ मै

आसमा में जब देखो तो

बादलों का पानी हूँ मै

किसी से अनजानी नहीं बस

सबकी यादों से बेगानी हूँ मै

पर्वतों की ऊंचाई से

समंदर की गहराई हूँ मै

हर किसी के सोच से परे

सबकी उमीदों में समाई हूँ मै

इन्द्रधनुष की परछाई सी

रंगों से भरी हूँ मै

दुनिया के लिए बस हूँ एक लड़की

पर अपने माँ बाबा की परी हूँ मै

मैं मिलूंगा तुमसे

इसी जन्म में
मैं तुम से मिलूँगा किसी दिन

डाक में जैसे मिलती है चिट्ठी
हाथों से मिलते हैं दस्ताने
डायरी में मिल जाता है कोई पुराना पता
सड़क पर मिले किसी नोट
और भूलने के बहुत दिन बाद
अचानक याद आए एक फ़ोन नम्बर की तरह मैं तुम से मिलूँगा

पढ़ कर पहले दिन स्कूल से घर लौटे बच्चे की तरह या
सुखांत नाटकों के उपसंहार पर जैसे मिलते हैं बिछुड़े हुए लोग

मुझे भरोसा है
कभी न कभी परिचित किसी हस्तलेख
किसी स्वाद
किसी सुगन्ध
किसी ध्वनि
किसी अर्थ की तरह
अचानक किसी दिन मैं तुम से मिलूँगा।

हम बच्चे प्रात:उठ जाते

हम बच्चे प्रात:उठ जाते

ठण्डे पानी से, खूब नहाते,

नहा-धो नित ताजा हो जाते

घडियाली देख वर्दी पहनते,

स्कूल नियम-पालन से जाते

नास्ता भी झट से खाते ,

हम सबसे बोलें आते जाते

चले-चले-चले, हम चले नमस्ते,

करें नमस्ते , उठाएं बसते

हम चलते हैं स्कूल के रस्ते,

पढने से न हम घबराते

हंसी ख़ुशी पढने को जाते,

गुरु हमारे- हमें हंसते

नई-नई बातें सिखलाते,

रोज गुरु नया पाठ पढ़ते

उसी पाठ को हम दोहराते,

पढने में आनंद आ जाता

कवि सार जब गुरु समझाते,

सूर्य देव जी हँसते आते

सूर्य देव जी हँसते आते
हलके ताप से हमें जगाते,

गर्मी में गुस्सा दिखलाते
सर्दी में सब जन को सुहाते,

धरती तपती अंबर तपता
अग्नि देव का ताप न घटता,

पल-पल में दिन-रात बनाते
कर प्रकाश वो प्राण बढ़ाते,

प्रात:काल पूरब से आते
सांय काल पश्चिम को जाते,

उर्जा का वह स्रोत है भारी
सभी गृहों का पालन हारी,

नन्हे मुन्हे बच्चे हैं

नन्हे मुन्हे बच्चे हैं

हम देश के सच्चे बच्चे हैं,

मर-मिट जाएँ देश की खातिर

साहसी वीर हम अच्छे हैं,

मात-पिता की आँख के तारे

नटखट प्यारे-प्यारे हैं,

मुस्काते हम फूल के जैसे

आँगन छवि सहारे हैं,

निराला-बचपन

बचपन तो होता है निराला

निश्छल, निर्मल,मस्ती वाला

दुनिया से उसको क्या मतलब

वो तो खुद ही भोला- भाला ।

मां की गोदी में लोरी

सुन कर वह तो सो जाता

बातें करता परियों के संग

सपनों में वो मतवाला ।

ना कोई चिंता,ना ही फ़िकर

मस्ती में बीते हर पल

चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान

देख के हंस दे रोने वाला।

बचपन सबके संग में खेले

ऊँच नीच की बात न मन में

सबके दिल को प्यार से जीते

वो तो है मन मोहने वाला।

वो धमा चौकड़ी,वो लड़ी पतंग

वो ब्याह रचाना गुड़िया का गुड्डे के संग

वो पूड़ी हलवा मेवे वाला

सच में वो बचपन अलबेला।

कुछ खट्टा कुछ मीठा बचपन

होता कुछ कुछ तीखा भी बचपन

भूले से भी ना भूलने वाला

यादों में हरदम बसने वाला।

काश ये बचपन हरदम रहता

दुनिया का उसपर रंग ना चढता

कोई अगर मुझसे पूछे तो

माँग लूँ दिन फ़िर बचपन वाला।

000

पूनम श्रीवास्तव

अक्की बक्की

अक्की बक्की करें तरक्की
तेरी मेरी दोस्ती पक्की ,

हम दोनों हैं,कितने लक्की
दोनों मिलकर,करें तरक्की ,

गेंहूं पीस रही है चक्की
अच्छी लगे न पूरी कच्ची ,

माँ के हाथ रसोई है सच्ची
साग-से खाएं,रोटी-घी-मक्की ,

मम्मी-पापा को,हम दें पप्पी
यारों को दें,यारी की झप्पी ,

नाम है अपना,अक्की बक्की
पढ़ लिख कर,हम करें तरक्की ,

मेरा भारत प्यारा

फूल-फूल पर लिखा मिलेगा
मेरा भारत मुझको प्यारा.

कण-कण को जयघोष सुनाती
खिली हुई है हर फुलवारी
वीरों की यह पावन धरती
सबके लिए बनी हितकारी
तुम चाहो, सौरभ ले जाओ
दे दूँ मैं गुलदस्ता न्यारा.

यहाँ हवाएं घर-आँगन में
दिन भर आती-जाती रहतीं
आने वाले मेहमानों को
मीठा गीत सुनाती रहतीं
जाने वाला कह कर जाता
मैं लौटूंगा फिर दोबारा.

हंसी-ख़ुशी की हरियाली है
अमन-चैन की धूप सुहानी
हर मौसम में प्यार घुला है,
चिड़ियाँ कहतीं प्रेम की बानी.
सुनने वालों की आँखों में
झूला झूले गगन हमारा.

सात सुरों के लगते मेले
नित्य यहाँ पर साँझ-सवेरे
अगला जन्म यहीं प्रभु देना
यदि फिर हों जीवन के फेरे.
दो मीठे बोलों में बसता
अपना देश-प्रेम का नारा.

-सुधीर सक्सेना ‘सुधि’

सैर सपाटा

कलकत्ते से दमदम आए
बाबू जी के हमदम आए
हम वर्षा में झमझम आए
बर्फी, पेड़े, चमचम लाए।

खाते पीते पहुँचे पटना
पूछो मत पटना की घटना
पथ पर गुब्बारे का फटना
तांगे से बेलाग उलटना।

पटना से हम पहुँचे राँची
राँची में मन मीरा नाची
सबने अपनी किस्मत जाँची
देश-देश की पोथी बाँची।

राँची से आए हम टाटा
सौ-सौ मन का लो काटा
मिला नहीं जब चावल आटा
भूल गए हम सैर सपाटा !

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