शब्द…वर्ण पिरामिड एवं डमरू…सी.एम्.शर्मा…

विधा :: वर्ण पिरामिड १. हैं शब्द आहट गर्माहट इश्क़ तराना प्यार नज़राना घर घर फ़साना २. है नाद निशब्द जय घोष आत्मीय बोध अहम ब्रह्मास्मि सचराचर  स्वामी विधा …

ईमान – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

दौलत मिली ईमान बदल गया पाकर जिसे इंसान बदल गया। नसीहत देने वालों की कमी नहीं बस अंदाज़-ए -निदान बदल गया। भरोसा कौन किस पर करेगा अब सच पैमाने …

जनसंख्या – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सारे समस्याओं का जड़ है जन संख्या का बढ़ जाना समस्याओं हल करते करते आपस में ही लड़ जाना। बेरोजगारी अराजकता मंहगाई सब के सब भारी है गरीब किसान …

“शिवेंद्रवज्रा स्तुति”

“शिवेंद्रवज्रा स्तुति” परहित कर विषपान, महादेव जग के बने। सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।। माथ नवा जयकार, मधुर स्तोत्र गा जो करें। भरें सदा भंडार, …

चंद खुशिओं का भी ख़ज़ाना है- SALIM RAZA REWA

शाम आना है सुब्ह जाना है दिल सितारों से क्या लगाना है oo दिल ये कहता है तुम चले आओ आज मौसम बड़ा सुहाना है oo प्यार,उल्फ़त,वफ़ा,मुहब्बत, सब ये …

याचक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

याचक हूँ मांगता द्वार द्वार करता हूँ विनती बार बार। कोई रहम करे बस सोचता मैं अपने आप पर कोशता। मैं इसी वतन का साथी हूँ जलता मद्धिम सा …

भिक्षुक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

भिक्षुक हूँ मारा मारा फिरता हूँ। भूखा बिलकुल शांत कभी उठता कभी गिरता हूँ भिक्षुक हूँ मारा मारा फिरता हूँ। घर बार नहीं मेरा यहाँ वहाँ भटकता हूँ भिक्षुक …

तुम मामूली हो, मामूली बन कर रहो ना

गड़े मुर्दे मत उखाड़ो यारो कुछ लोगो की सुकून की नींद क्यों गायब करना चाहते हो तुम मामूली हो , मामूली बन कर रहो ना ये तो खेल है …

सबसे छोटा क़ाफ़िया, और सबसे लंबी रदीफ़ की ग़ज़ल – SALIM RAZA REWA

जब, तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी लब, तुम्हारी मोहब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी oo तुम मेरे …

मेरे देश की औरते

औरते मेरे देश की औरते बड़ी विचित्रता का बोध कराती है अपने आत्मसम्मान की चिंता किये बिना सब कुछ करती जाती है वो बस सबसे प्रेम करती जाती है …

छोटा क़ाफ़िया, और लंबी रदीफ़ की ग़ज़ल – SALIM RAZA REWA

वतन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ अमन की बात करनी हो तो मेरे पास आ जाओ oo बहारों से नज़ारों से सितारों से नहीं मतलब …

माटी मांगे प्रीत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

माटी मांगे प्रीत यह, धरती रहे पुकार बातें फिजूल छोड़के, इसपे करें विचार। खून की होली अब तुम मत खेलो अपनी गलती दूसरे पर न ठेलो। आपस में मिलके …

कुण्डलियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चूनर धानी ओढ़ के, बैठी आँगन आय अम्मा चाची देखके, दुल्हिन गयी लजाय। दुल्हिन गयी लजाय, देखके अम्मा तरसे घर आ गई बहार, खुशी से कलियाँ बरसे। घर का …

अपना शहर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपना ही शहर क्यों बेजान सा लगता है जर्रा जर्रा मुझे अब अंजान सा लगता है। भूले अपनी काबिलियत तुम्हें देखकर बदले हुए नजारे परवान सा लगता है। देखकर …