Category: अज्ञात कवि

प्रतिशोध

कब तक पठानकोट,कब तक उरी कब तक सहेंगे पुलवामा अब तो जागो हे पुरूषोत्तम करो आतंकरूपी रावण का खात्मा भाता नही अब छोटी सर्जरी न भाता अब कोई वार्ता …

होली

अयोध्या से लेकर जनकपुर तक राम खेले होली जानकी संग मथुरा से लेकर वृन्दावन तक श्याम खेले होली गोपियों संग सरयू से लेकर यमुना तक होली के रंग में …

संदल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

संदल संदल वन को महकते देखा संदली रंग चमकते देखा। कुंदन – कुंदन सा लगता है बसंती हवा बहकते देखा।। तपो भूमि की जैसी लगती चह – चह चिड़ा …

अभी टूटा नहीं है ख्व़ाब मेरा-Bhawana kumari

तुमने बहुत कोशिश की थी मेरे ख्व़ाबो को तोड़ने की, पर जान लो मैंने टूटने नहीं दिये है अभी तक ख्व़ाब अपना जिंदा है वो अब भी मेरे आँखों …

सक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

सक में स्वभाव बदल जाता वक्त ऐसे यह निकल जाता। बात की तह तक जाता कौन आदमी ऐसे फिसल जाता। समझा भी तो देर हो गयी बाँझ पेड़ भी …

दुल्हिन – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चूड़ी कंगन हाथ में , गजरा शोभे माथ कन बाली है सोभती , बिंदी पायल साथ। घूंँघट में बैठ जब गयी , तब आई मुस्कान रूप सलोना दिख गया …

ख़्वाब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ख़्वाब ही कुछ ऐसा था जो अधूरी रह गयी गिरेबान में झाँका नहीं जो दूरी रह गयी। खामख्वाह परेशान होते रहे जिंदगी भर मृग की तरह ढ़ूढता रहा पास …

रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

बिजली चमकती जैसे आसमान का आईना बन गया लफ्ज़ इंसान का। हर चेहरे से परेशाँ है क्यों आदमी कोई मिलता नहीं अब पहचान का। ऐसा कोई नहीं पढ़ सके …

रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

विद्या – दोहा जो मांगो मिलता सदा, भोले से वरदान निर्बल को भी देखिए , है तेरा संतान। दानव को वर में दिया, जो मांगा मुँह खोल हम मानव …

आनंद विहार ( दिल्ली ) से गया और गया से भागलपुर दो लात मारके ट्रेन का रोमांचकारी सफर !!

जन्म लेने के पश्चात से ही एक आम व्यक्ति से अधिक यात्रा शायद जीवन रेखा में अंकित है तभी तो अनायास ही न चाहते हुये अनचाहे यात्राओं में अपनी …

सैनिक वीर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

चिथड़े – चिथड़े उड़ गये, खून की बह गयी नदियाँ फूट  पड़ा  ज्वालामुखी , दहल  गयी  सब  सदियाँ। कैसा  षडयंत्र  है  तेरा  , वार पीठ पर करने का डर …

शहादत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

गद्दारों को फांसी दे दो, भीतर  घात  जो  करते हैं अपने वतन के  खाते हैं , गले दुश्मन  के लगते हैं। सबसे पहले घर को देखो, युद्ध फिर तुम …