Category: अज्ञात कवि

कर्तव्य – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

देने वाला एक है दाता मांगे लाख करोड़ आश लगाये बैठे बैठे अपना सिर ना फोड़। इतनी सुंदर काया देकर बुद्धि ज्ञान भर भेजा जैसी कर्तब्य अब फल वैसी …

जिंदगी

आधी रात कहकशाँ में गुजरी,आधी रात ख्वाबों की ओर मुड़ गयी। यही सिलसिला चलता रहा उम्र भर मेरी जिंदगी कभी आसमाँ सी खुशनुमा तो कभी सुलेमानी कीड़ा रही।।  

मैं प्यार नही कर सकता

समझ गया मैं भली भांति दुनिया के तौर तरीकों को चोरो का पलड़ा भारी है मिलती राहत न सरीफों को क्यों दिल लगाने से अक्सर दिल चूर चूर हो …

जिंदगी की किताब…… काजल सोनी

तीन पन्ने हैं हमारी जिंदगी की किताब में…. पहला पन्ना पलट चुका है जिसे हम दुबारा नहीं पलट सकते …… तीसरा पन्ना जो वक्त आने पर खुद ब खुद …

क्यों बदली बदली ये नजरें

    क्यों बदली बदली ये नजरें , क्या दिल मे छुपाये बैठी हो गर प्यार मेरा तुम चाहती हो , क्यों पलकें झुकाये बैठी हो इक बार करो …

हाइकु – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

बिन लगाम छल कपट धोखा धारावाहिक टूटते रिश्ते करती गुमराह रूठा दिल नहीं करते मतलब की बातें टाल मटोल मुंह में राम हत्या अपहरण दहाड़े दिन क्यों करते हैं …

रिश्तों का तानाबाना – अनु महेश्वरी

बचपन से बुढ़ापे तक के सफर में, रिश्तों का तानाबाना बुनते बुनते, हम एक जाल सा बुन तो लेते है, पर ज़िन्दगी के अंतिम पड़ाव में, कुछ, साथ छोड़ …

मीठा फल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

गलत फहमिओं में जीना कोई जीना नहीं मस्त होकर जीओ,तेरा हक तुझे मिलेगा बस तुम सिर्फ आम बोओ मैं तुम्हें मीठा फल दूंगा।

इंसान हूँ

थकी आवाजें,आबरू बगल में,दकियानूसी का लिबास पहनता हूँ। नफरत का व्यापार लगा,सौदा रूहानी कलपुर्जों का करता हूँ।। बिखरी साँसे,खुद से अपरिचित,खबरेें जुबां पे परिंदों की रखता हूँ। इस ज़हान की …

|| ईमानदारी की परीक्षा ||

जब जीवन की जीवनी मे, जब मैने ईमानदारी का चुनाव किया । शुभेच्छुओं का लगता रहा तांता, सबने एक सा मशवरा दिया ।।1 ।। इस राह मे ‘मित्र’ दोस्त …

बस छोटी सी है गिला

तोड़ दिए मैंने अपने सारे सपने, साथ नही है मेरे अपने, मुझे उनका प्यार नही मिला, बस यही है छोटी सी गिला। उन्होंने मुझे बहुत दर्द है दिया, फिर …

वक्त – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

वक्त का बहाना अच्छा है अंधे को आईना दिखाना अच्छा है मजबूरियों की बात कुछ और है साहब अच्छों – अच्छों को मुर्ख बनाना अच्छा है।

सपनों का टुटना

मैंने अपने सपनों को टुटते देखा है मैंने अपने अरमानों को कुचलते देखा है। ख्वाहिश नहीं थी मुझे किसी राजधराने की बहुँ बनु। ख्वाहिश नहीं थी मुझे किसी जमींदार …