Category: सुनील गुप्ता ‘श्वेत’

सारी बातें सुनी-सुनायीं !!

सारी बातें सुनी-सुनायीं, किन बातों पर यकीं करें, और कौन सी बातें, बात बनायीं ! सारी बातें सुनी-सुनायीं !! इसने कहा कुछ, उसने सुना कुछ, इसने किया कुछ, उसको …

ये दिल जो कहे हम करते रहें…

कुछ कह ना सकूँ, चुप रह ना सकूँ ! ना इसमे सुकूं, ना उसमे सुकूं !! किस कफ़स ने मुझको बाँध रखा, कि आग हूँ मैं, पर जल ना …

सभ्य समाज!!!-1

कितनी दफ़े मैं सोचता हूँ, तेरे साथ चलूँ, पर हर बार, तू मुझसे आगे निकल जाता है. पता नहीं, ये तुम्हारी आदत है, या तुम मुझे साथ लेना नहीं चाहते, …

लबों की हताशा…

सफ़हे में लिपटी है, लम्हों की बातें, लम्हों की बातें, सदियों की बातें। बातें, जो पूरी हुई ही नहीं, बातें, जो अधूरी रह गयी। बातें, जो कह गयी अनकही, बातें, जुबां तक, …

ज़िन्दगी एक कोरा कागज़ है…

मन की चादर बहोत ही मैली है, आओ गंगा को चल के गन्दा करें। इन्सानियत नहीं है लोगों में, धर्म का इनसे चलके धंधा करें। ना तुम्हारी है और ना मेरी …

मुस्कुराने के वजह!!!

मुस्कुराने के वजह!!! पहले बहोत से थे, कभी नन्ही सी तितली को देखकर उसके पीछे भागना, तो कभी, खाली माचिस की डिबिया को उछालना… कभी सन्तरे वाली टॉफी पाकर यूँ …

कुछ शे’र मार रहा हूँ…

“तुझे पा ना सका, ये ग़म है मुझे, तेरा नाम मगर, मरहम है मुझे…” “ना कर इतना गुमां, पलकों पे मेरी, चढ़ के तू ऐ अश्क, कि चढ़ आया …

ज़िन्दगी के कैनवास पर…

ज़िन्दगी के कैनवास पर, आते, अपलक दृश्य… हँसते-हंसाते, रोते-रुलाते, गाते-गुनगुनाते, दिखाते हैं वो मंज़र, जिनसे बन सके, एक, सम्पूर्ण चित्र… पर, रह जाती है, अधूरी! हमारे लिहाज से… क्योंकि, …

सभ्य समाज…

हमें चिढ़ है, भेड़ चाल से, तभी तो हम रहते हैं, हमेशा, जल्दी में, आगे निकलने की होड़ में… दूसरों का रास्ता काटते हुए, या, उन्हें पीछे धकेलते हुए, …

भटकन…

कल रात, कोई आह सी जल रही थी। जैसे, कोई शम्मा सी पिघल रही थी। कई मरासिम से जैसे छूट रहे थे। कुछ अपने, अपनों से रूठ रहे थे। कुछ मदहोश …

मैं अनलहक हूँ…

मैं, अनलहक* हूँ… सच तो यही है, ना, मानने की बात है। दुनियां, इसी बात से खफा होती है, और कभी, इसी बात को स्वीकार करती है; उसकी मर्जी …

हाय! री ये किस्मत…

ये गाना दिल्ली गैंग रेप पीड़ित दिवंगत दामिनी को श्रधान्जली है। हाय! री ये किस्मत… यह गाना यूट्यूब पर है, गाना सुनने वा देखने के लिये नीचे दिये लिन्क को क्लिक करे… Hay Ri Ye …

मुझे मंज़िल की तलाश नहीं!!!

ये सच है, मुझे मंज़िल की तलाश नहीं!   क्योंकि, मंज़िलों पर पहुंचकर, बैठ जाते हैं, लोग… आराम से, इत्मिनान से, बेफिक्र! जैसे, करने को कुछ, बचा ही ना हो।   …

जबकि, जानता हूँ…

रात को जब, लेटता हूँ, तो छत पर तारे दिखते हैं, और मैं, उन्हें गिनता हूँ। जबकि, जानता हूँ, गिन नहीं पाउँगा।।।   सुबह मेरे ऑफिस के टेबल पर, काग़ज के …

मेरे पेट से…

कभी-कभी, मेरे पेट से, कुछ आवाज़ें आती हैं। जब मैंने, किसी एक वक़्त का, भोजन, नहीं कर पाया होता है। (किन्ही कारणों से)   तब सोचता हूँ, ये इतना भी …

रोज रात…

रोज रात, जो सितारे, आसमां पर चमकते हैं, आ जाते हैं, मेरे कमरे में, और चमकते हैं, छत से चिपककर, और मैं, उन्हें टकटकी बांधे देखता हूँ। शायद, वो भी …

शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है…

ईमान फिर किसी का नंगा हुआ है. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है.. वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है. ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है.. फिर से गलियां देखो खूनी हुई हैं. गोद कितने मांओं की सूनी हुई हैं.. उस इन्सान का, क्या कोई बच्चा नहीं है? वो इन्सान क्या, किसी का बच्चा नहीं है?? हाँ, वो किसी हव्वा का ही जाया है. वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है. ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है… लोथड़े मांस के लटक रहे हैं. खून किसी खिडकी से टपक रहे हैं.. आग किसी की रोज़ी को लग गयी है. कोई बिन माँ की रोजी सिसक रही है.. हर एक कोने आप में ठिठक गये हैं. बच्चे भी अपनी माँओं से चिपक गये हैं.. इन्सानियत का खून देखो हो रहा है. ऊपर बैठा वो भी कितना रो रहा है.. दूर से कोई चीखता सा आ रहा है. खूनी है, या जान अपनी बचा रहा है.. और फिर सन्नाटा सा पसर गया है. जो चीख रहा था, क्या वो भी मर गया है?? ये सारा आलम उस शख्स का बनाया है. …

मेरे पापा….

गाँवों की पगडंडियों पर मुझे घुमाते, मेरे पापा. चार आने की चार टाफियां खिलाते, मेरे पापा.. पकड के उँगली मुझे स्कूल ले जाते, मेरे पापा. बचपन में ही डाक्टर, इंजीनियर बनाते, मेरे पापा.. मेरी गलतियों पर मुझे चपत लगाते, मेरे पापा. कुछ अच्छा करने पर पीठ थपथपाते, मेरे पापा.. जब कुछ बडा हुआ गलत सही समझाते, मेरे पापा. दुनियां के हर शय से परिचित कराते, मेरे पापा.. अब मैं बडा हो गया हूँ, अपने पैरों पर खडा हो गया हूँ. तो बस यही सोचता हूँ, क्या मैं बन पाउँगा, जैसे हैं मेरे पापा? क्या मैं अपने बच्चे को वो सब दे पाउँगा? क्या मैं मेरे पापा की तरह अच्छा पापा बन पाउँगा?? क्या मैं बन पाउँगा, मेरे बच्चे के लिए… मेरे पापा….

हमें, इजाजत नहीं है !!!

हाल-ए-दिल अपना, सुनाने की इजाजत नहीं है. हमें दुःख अपना, बताने की इजाजत नहीं है.. उन्हें फुरसत नहीं है, हमपर सितम करने से. और हमें, छटपटाने की भी इजाजत नहीं है.. वो हमें लूटें, कि मारें, या चाहे कत्ल कर दें. सर हमें अपना उठाने की इजाजत नहीं है.. अधिकार बोलने का सुरक्षित है, अब तो संसद में. आवाम को तो खुसफुसाने की भी इजाजत नहीं है.. फुरकत में वो आज इतना है कि, मिलने को आता नहीं. और हमको उसके पास, जाने की भी इजाजत नहीं है.. वो मजाक कर रहे हैं, देश के भविष्य से और. कार्टून भी हमें उनका, बनाने की इजाजत नहीं है..

बुनियाद जिसकी खोखली हो, वो मकान क्या होगी..

जो वादों से अपने मुकर जाए, वो जुबान क्या होगी. बुनियाद जिसकी खोखली हो, वो मकान क्या होगी.. छाया तलक ना दे सके, वो वृक्ष है किस काम का. दो बूंद को तरसे जमीं, वो आसमान क्या होगी.. फैला हुआ असमानता का जाल हो जिस देश में. है सोचने की बात, वहाँ का संविधान क्या होगी.. हर फिक्र छोडकर के, सो जाता है ‘श्वेत’ जिस जगह. माँ के आँचल के सिवा, कोई और जहान क्या होगी.. रावण भरे पडे हैं यहाँ, राम के मुखौटों में. है ‘श्वेत’ सोच में पडा, विधि का विधान क्या होगी..

बेहतर कई आए गये…

जिन्दगी की राह में, हमसफर कई आए गये. हम अभी तक हैं वहीं, मंजर कई आए गये.. एक वही आया नहीं, आने का अहद जो कर गया. वगरना दोस्त-औ-अदूं, इधर कई आए गये.. जिन्दगी में गम का कोहराम है कुछ इस कदर. कि रात है बस रात है, सहर कई आए गये.. हर कोई समझे है बेहतर, जाने क्यों अपने आप को. पर सच है ‘श्वेत’ कि यहाँ, बेहतर कई आए गये..

जिन्दगी में वो कभी विफल नहीं होता…

जिनके हौसलों में शंका का बादल नहीं होता. जिन्दगी में वो कभी विफल नहीं होता.. और जिनको ऐतबार ना हो अपने आप पर. वो शख्स कभी उम्र भर सफल नहीं होता.. पत्थर नहीं उछालता कोई उन दरख्तों पर. जिनकी शाखों पर कोई फल नहीं होता.. रात ना होती कभी इतनी गहरी, काली. जो तुम्हारी आँखों में काजल नहीं होता.. संसद में ढूंढ रहे थे हम, एक अच्छा नाम. पर कीचडों में शायद अब कंवल नहीं होता.. ऐ ‘श्वेत’ शायद तुझको कोई पहचानता नहीं. अगर तू लिखता ग़ज़ल नहीं होता..

दिल में है दर्द, तो गजल करना पडेगा…

अपने शब्दों को थोडा सरल करना पडेगा. दिल में है दर्द, तो गजल करना पडेगा.. गर बनना है सूरज, चमकने के लिये तो. दोस्तों अन्दर ही अन्दर, जलना पडेगा.. मन्जिलों तक पहुँचना है तो रस्तों पर. तन्हा बहोत दूर तक, चलना पडेगा.. बदलाव कोई बडा, लाना है तो ‘श्वेत’. पहले खुद अपने आप को बदलना पडेगा.. वरिष्ठ जनों का हार, बनाने के लिये माली को. कुछ मासूम फूलों को, मसलना पडेगा…

जनता का तो बज गया बाजा, अन्धेर नगरी, चौपट राजा…

जनता का तो बज गया बाजा, अन्धेर नगरी, चौपट राजा.. २जी घोटाला करे ‘ए राजा’, अन्धेर नगरी, चौपट राजा.. पूछा जो उनसे, तो कहते हैं राजा, सब करते हैं घोटाले, कोई हमको नहीं बताता.. जनता का तो बज गया बाजा, अन्धेर नगरी, चौपट राजा… तोहमत तो हमपर ऐसे ना लगाओ, चोर आप हमको ऐसे ना बुलाओ. सब खाते होंगे, मैं नहीं खाता.. जनता का तो बज गया बाजा, अन्धेर नगरी, चौपट राजा… पर राजा जी इतना तो बताओ, जो चोर हैं, उनको तो हटाओ. दुनियां सरी पहचाने है उनको, क्यों आपको ही वो नजर नहीं आता.. जनता का तो बज गया बाजा, अन्धेर नगरी, चौपट राजा…

कातिल तो एक ही था, पर खन्जर बदल गए….

कातिल तो एक ही था, पर खन्जर बदल गए. कुछ इस तरह से सारे, मन्जर बदल गए.. हमको तो मिल ही जाता, वो प्यार का मोती. बदकिस्मती अपनी, कि समन्दर बदल गए.. गर जीतना है जीतो, दिलों को मेरे दोस्त. वतन जीतने वाले सभी, सिकन्दर बदल गए.. सच-झूठ और सारे नियम कानून. रिश्वत मिली तो सरे, अन्तर बदल गए.. देखकर संसद की हालत, ‘श्वेत’ सोचता हूँ. जानवर बदल गए हैं, या जंगल बदल गए..