Category: ज़ैदी जाफ़र रज़ा

सोचता हूँ ज़हन के सारे दरीचे खोल दूँ

अमेरीकी पोते के यौमे-विलादत पर सोचता हूँ ज़हन के सारे दरीचे खोल दूँ गुलशने-इद्राक के खुशरू बगीचे खोल दूँ जज़्बए-दिल के तिलिस्माती गलीचे खोल दूँ और मैं यौमे-विलादत पर …

वो कल था साथ तो फिर आज ख्वाब सा क्यों है

वो कल था साथ तो फिर आज ख्वाब सा क्यों है बगैर उसके ये जीना अज़ाब सा क्यों है कहाँ गया वो कोई तो बताये उसका पता दिलो-दमाग में …

लहरें साहिल तक जब आयीं

लहरें साहिल तक जब आयीं, चांदी के वरक़ चिपकाए हुए. हम हौले-हौले पानी में, चलते रहे दिल गरमाए हुए. वो देखो उधर उस कश्ती पर, दो उजले-उजले कबूतर हैं, …

रिश्ता नहीं किसी का किसी फ़र्द से मगर

रिश्ता नहीं किसी का किसी फ़र्द से मगर. हम-मज़हबों के साथ हैं हमदर्द से मगर. जब आई घर पे बात तो लब बंद हो गए, पहले बहोत थे गर्म, …

रात की ओस दरख्तों पे गिरी होगी ज़रूर

रात की ओस दरख्तों पे गिरी होगी ज़रूर. ज़िन्दगी अपनी भी कुछ यूँ ही कटी होगी ज़रूर. ज़िक्र आता है तो झुक जाती हैं आँखें उसकी, मुझसे मिलने की …

मैं तनहा हूँ , नहीं भी हूँ

मैं तनहा हूँ , नहीं भी हूँ के मेरा ज़हन खाली एक पल को भी नहीं रहता न जाने किन खयालों के सफरनामे हमेशा सामने रहते हैं जिनको पढता …

बदन की खुशबू

रौज़ने-ख्वाब से आती है बदन की खुशबू। है यक़ीनन ये उसी गुंचा-दहन की खुशबू। उसने परदेस में की मेरी जुबां में बातें मुझ को बे-साख्ता याद आई वतन की …

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़. हो आयें चलिए मीर तकी मीर की तरफ़. कहता है दिल कि एक झलक उसकी देख लूँ, उठता है हर …

जिस्म के ज़िन्दाँ में उम्रें क़ैद कर पाया है कौन

जिस्म के ज़िन्दाँ में उम्रें क़ैद कर पाया है कौन. दख्ल कुदरत के करिश्मों में भला देता है कौन. चाँद पर आबाद हो इन्सां, उसे भी है पसंद, उसकी …

ज़ह्र पी लेते हैं क्यों लोग परीशां होकर

ज़ह्र पी लेते हैं क्यों लोग परीशां होकर हम तो खुशहाल रहे बे-सरो-सामां होकर लौट आओगे कभी इसका गुमां था किसको एक टक देख रहा हूँ तुम्हे हैरां होकर …