Category: वन्दना गुप्ता

पपडाए अधरों की बोझिल प्यास

सुनो कहाँ हो …………? मेरी सोच के जंगलों में देखो तो सही कितने खरपतवार उग आये हैं कभी तुमने ही तो  इश्क के घंटे बजाये थे पहाड़ों के दालानों में सुनो …

ओस में नहायी औरतें

ओस में भीगी औरत औरत नही होती होती है तो उस वक्त सिर्फ़ एक नवांगना तरुणाई मे अलसाई कोई धवल धवल चाँदनी की किरण अपने प्रकाश से प्रकाशित करती …

एक थिरकती आस की अंतिम अरदास

जो पंछी अठखेलियाँ किया करता था कभी  मुझमें रिदम भरा करता था जो कभी  बिना संगीत के नृत्य किया करता था कभी  वो मोहब्बत का पंछी आज धराशायी पड़ा …