Category: ऋतु पल्लवी

शब्द नहीं कह पाते

कोई बिम्ब,कोई प्रतीक ,कोई उपमान नहीं समझ पाते ये भाव अनाम जैसे पूर्ण विराम के बाद शून्य-शून्य-शून्य और पाठक रुक कर कुछ सोचता है पर लेखक लिखता नहीं लेखक …

वेश्या

मैं पवित्रता की कसौटी पर पवित्रतम हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे समाज को अपवित्र होने से बचाती हूँ। सारे बनैले-खूंखार भावों को भरती हूँ कोमलतम भावनाओं को पुख्ता करती हूँ। …

याद

शांत-प्रशांत समुद्र के अतल से उद्वेलित एक उत्ताल लहर वेगवती उमड़ती किसी नदी को समेट कर शांत करता सागर। किसी घोर निविड़तम से वनपाखी का आह्वान प्रथम प्यास में …

मृत्यु

जब विकृत हो जाता है,हाड़-मांस का शरीर निचुड़ा हुआ निस्सार खाली हो जाता है संवेदना का हर आधार.. सोख लेता है वक्त भावनाओं को, सिखा देते हैं रिश्ते अकेले …

जीने भी दो

महानगर में ऊँचे पद की नौकरी अच्छा-सा जीवन साथी और हवादार घर यही रूपरेखा है- युवा वर्ग की समस्याओं का और यही निदान भी। इस समस्या को कभी आप …

क्यों नहीं

नीला आकाश ,सुनहरी धूप ,हरे खेत पीले पत्ते ही क्यों उपमान बनते हैं ! कभी बेरंग रेगिस्तान में क्यों गुलाबी फूलों की बात नहीं होती ? रूप की रोशनी ,तारों की …

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना

कभी-कभी यूँ ही मुस्काना मन को भाता है. पावस के पीले पत्तों को स्वर्ण रंग दे हार बना निज स्वप्न वर्ण दे वासंती सा मोह जगाना,मन को भाता है. …

अकेलापन

एक दिन जब बहुत अलसाने के बाद आँखे खोलीं, खिड़की से झरते हल्के प्रकाश को बुझ जाते देखा एक छोटे बच्चे से नन्हे सूरज को आते-जाते देखा नीचे झाँककर …