Category: रचना शर्मा

हमारी नदियों की दुर्दशा पर .. किसी की आँख में आंसू किसी का जख्म रिसता है यहाँ अट्टाहसों की गोद में भी दर्द पलता है जिसे देखो वही आतुर …

मेरा घर

मेरा घर …. जिसकी दीवारें बाहें पसारें रहती हैं प्रतीक्षारत किसी आगंतुक के लिए जब भी कोई देता है दस्तक दरवाजे पर मेरा घर मुस्कुराकर ले लेता है उसे …

अकालग्रस्त

ज़िन्दगी होती है अकालग्रस्त जब खुशियों की जमीं लगती है दरकने उत्साह के वृक्ष से झरने लगती हैं उम्मीद की पत्तियां रिश्तों की छाँव दबे पांव खिसक जाती है …

घर

इस घर में झांककर देखो जरा यहाँ बारिश आती है भिगोने खुद को धूप सेंकती है अपना बदन नींद हर रोज़ करती है जागरण और भूख ठहर गयी है …

ख्वाबों के टुकड़े

रोज देखती हूँ उसे बटोरते हुए ख्वाबों के टूटे टुकड़े फिर उन्हें सहेज कर रखते हुए उम्मीद के पिटारे में इंतज़ार है मुझे उस पल का जब ख्वाब पिटारे …