Category: प्रियंका ‘अलका’

समझ से परे – प्रियंका ‘अलका’

तुम कहते हो तुम्हें मेरी रचनाएँ समझ में नहीं आती फिर भी तुम चाहते हो मैं हमेशा लिखती रहूँ …… मैं तुम्हारी बात समझ सकती हूँ । धरा पर …

छल -प्रियंका ‘अलका’

तुम्हें नहीं मालूम मैंने तुमसे बहुत सारी बाते छिपा कर रखी हैं बहुत सारी……… जैसे, रोटियां बनाते वक्त सबसे गोल रोटी मैं तुम्हारे लिए रखती हूँ, तुम्हारे पसंद की …

बोलो प्रिय- प्रियंका ‘अलका’

बोलो प्रिय तेरी फैली दृगो में आज कैसी उलझन क्यों तेरी बातो की लड़ी का आज टूटा स्पंदन। उर में तेरी दबी है आज कैसी पीड़ा जो सुनकर मेरी …

भारी है….. -प्रियंका ‘अलका’

आज साँस भारी है जज्बात भारी है तेरी कही हर बात आज बेहिसाब भारी है । आज मुझ तक पहुँचती हवाऐं भारी हैं किरनों में लिपटी आशाऐं भारी हैं …

दाग – प्रियंका ‘अलका’

दर्पण -दर्पण देख रही थी रूप-रंग के जटिल भेद को खड़े -खड़े निर्रेद रही थी । अंदर -बाहर देख-देख दृगे जब थोड़ी शांत हुई, दर्पण पर फैले असंख्य दागो …

किसान

बोल रे मन! ये कैसी दुनिया, जिसका उपजा खाते वही तिरस्कृत रहते। जल-जल जिसका लहू, तप-तप पसीना बनता, धरा के ह्रदय को चीर-चीर, अपनी उम्मीदें बोता, पर न दुख …

आज फिर……

सुनहरी किरनों को पंकिल होते देखा है, इंद्रधनुष के रंगों को बोझिल होते देखा है, चंदा की चाँदनी को खुद में सिमटते देखा है, सुरीले रागों को बेसुरा बन …

सिमटन

मैं जानती हूँ, कभी -कभी मैं तुम्हें बहुत पीड़ा देती हूँ , तुम्हारे ह्रदय पर गहरी चोट करती हूँ । पत्थर सी अपनी कठोर वाणी से, तुम्हारे मन की …

हार

अब यही दुनिया की रीत है, हर रिश्ते से मिटती लकीर है। अनुशासन अब कोसो दूर है, स्वतंत्रता निज गढ़ता नया रूप है। । अब फुर्सत नहीं किसी के …