Category: नूर मुहम्मद `नूर’

हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख

हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख हम ही हम अक्सर हुए हैं खेत, अपने मुल्क …

सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं

सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं किसने ऐसा वक़्त मेरे गाँव में काटा नहीं शोर है कमियों ही कमियों का हर इक लम्हा यहाँ मेरे घर …

वे ख़ामख़ाह हथेली पे जान रखते हैं

वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं अजीब लोग हैं मुँह में ज़ुबान रखते हैं ख़ुशी तलाश न कर मुफ़लिसों की बस्ती में ये शय अभी तो यहाँ हुक़्मरान …

भूख जब वे गाँव की पूरे वतन तक ले गए

भूख जब वे गाँव की पूरे वतन तक ले गए मामला हम भी ये फिर शेरो-सुखन तक ले गए हम इधर उसके दुपट्टे को रफ़ू करते रहे वो, उधर …

बेहयाई, बेवफ़ाई, बेईमानी हर तरफ़

बेहयाई, बेवफ़ाई, बेईमानी हर तरफ़ धीरे-धीरे मर रहा आँखों का पानी हर तरफ़ सोचता हूँ नस्ले-नौ कल क्या पढ़ेगी ढूँढकर पानियों पर लिख रही दुनिया कहानी हर तरफ़ फिर …

बेमुल्क हो रहा है जो हिन्दोस्तान में

बे-मुल्क हो रहा है जो हिन्दोस्तान में हर पल समा रहा है मेरे ज़ेहनो-जान में भाषा तो खैर आपकी दुमदार हो गई क्या आग भी नहीं है ज़रा- सी …

पहले घर-घर जाइए, जाकर गुज़ारिश कीजिए

पहले घर-घर जाइए, जाकर गुज़ारिश कीजिए बैठकर एवान में फिर आप साज़िश कीजिए जीत के पहले वो जोड़े हाथ आए थे, मगर आपकी बारी है अब जाकर सिफ़ारिश कीजिए …

जो बँधी थी गाँठ में वो भी गँवाई हाय हाय

जो बँधी थी गाँठ में वो भी गँवाई हाय हाय आपकी बंदानवाज़ी रहनुमाई हाय हाय कब से फैलाए खड़े हैं हाथ, अपने राह में थामते हैं आप ग़ैरों की …

खेत के बाहर हैं फ़स्लें और पानी खेत में

खेत के बाहर हैं फ़स्लें और पानी खेत में इतना बरसाया खुदा ने मेहरबानी खेत में खेत ही था गाँव उनका खेत ही था देश भी डूब सपनों की …

किन सज़ाओं तक मुझे मेरी ख़ता ले जाएगी

किन सज़ाओं तक मुझे मेरी ख़ता ले जाएगी और कितनी दूर तक मुझको वफ़ा ले जाएगी मुझको अपने रास्ते का इल्म है अच्छी तरह क्यों कहीं मुझको कोई पागल हवा …

कितने उजले दिन बचे कितनी हसीं रातें बचीं

कितने उजले दिन बचे कितनी हसीं रातें बचीं जाने कितनी और लफ्ज़ों से मुलाक़ातें बचीं फ़िक्रो-फ़न शेरो-सुखन से भीग जाना सुबहो-शाम जानें कितनी और इस मौसम की बरसातें बचीं …

उनका सपना शब्द से पहचान सुन्दर चाहिए

उनका सपना शब्द से पहचान सुन्दर चाहिए मेरा सपना है कि हिन्दोस्तान सुन्दर चाहिए ज़िंदगी से छलछलाते शब्द ही मेरे यक़ीन उनको कविताओं क़ब्रिस्तान सुन्दर चाहिए फिर कहीं दहशत …

इस सदी -सी बेहया कोई सदी पहले न थी

इस सदी-सी बेहया कोई सदी पहले न थी इस क़दर बेआब आँखों की नदी पहले न थी क्या कहा जाए उजालों के सियह किरदार पर तीरगीबर्दार ऐसी, रौशनी पहले …

इधर पेच है तो मियाँ ,ख़म उधर भी

इधर पेच है तो मियाँ ,ख़म उधर भी वही ग़म इधर भी वही ग़म उधर भी है दोनों तरफ दर्दो-ग़म भूख ग़ुरबत दवा बम इधर भी दवा बम उधर …