Category: नचिकेता

शिकारी की नज़र

दुनिया को निरखो न शिकारी की नज़रों से वैसे तो दुनिया में ढेरों रंग भरे हैं यहाँ खेत खलिहान, नदी, पर्वत, दर्रे हैं इन्हें बचाना होगा ज़ालिम राहबरों से …

शाम

टूट गिरा पत्ते-सा दिन धुआँ पहनने लगीं दिशाएँ दीवालों के दाएं-बाएं किरणों की नाजुक टहनी पर झूल रहा छत्ते-सा दिन गीली चिड़िया की पाँखों से चूने लगा समय आँखों …

रात

पाखी लौट घरों को आए अंधकार ने पर फैलाए थकान मिटाने को दिन भर की सोयीं आँखें गाँव-नगर की घर, आँगन, छप्पर अलसाए अंधकार ने पर फैलाए जागी दुनिया …

मौन न अपने से टूटेगा

दिन कैसे बदलेंगे हवा नहीं बदली तो खिड़की, रोशनदान खुले पर, घनी उमस है बदहवास मन में बेचैनी गयी अड़स है खुशबू नहीं मिलेगी अगर न खिली कली तो …

मैं कैसे बदलूँ

मैं कैसे बदलूँ जैसे दिन रोज़ बदलता है रोज़ बदल जाती जैसे कैलेण्डर की तारीख़ राजभवन की अक्सरहाँ बदला करती है सीख रंग बदलते मौसम से मन बहुत दहकता …

मृदु संगीत कला का

जब-जब मैंने तेरे मन के अंदर झाँका है वहाँ मिला है मुझे प्यार का पसरा सहज उजास हर मौसम में खिलनेवाला टुहटुह लाल पलास गूंज रहा कण-कण में मृदु …

भूख बँटे पर

भूख बँटे पर, जिजीविषा की प्यास नहीं बाँटूंगा गर्दन भी काटूंगा केवल घास नहीं काटूंगा। निम्बू जैसा ही निचोड़ कर पिया हमारा ख़ून नफ़रत की भाषा में लिखकर मज़हब …

बेहद अपनी

जब से देखा तुमको भूल नहीं पाया हूँ जबसे देखा मुझे लगी बेहद अपनी-सी आंखों को पहचान दिलाती भौं, पिपनी सी एकाकीपन में भी खुलकर मुसकाया हूँ तुम्हें देखकर …

बहन का पत्र

कुशल-क्षेम से पिया-गेह में बहन तुम्हारी है सुबह सास की झिड़की वदन झिंझोड़ जगाती है और ननद की जली-कटी नश्तरें चुभाती है पूज्य ससुर की आँखों की बढ़ गयी …

बजा हथौड़ा, ठन-ठन-ठन !

बजा हथौड़ा ठन-ठन-ठन मिटके रहेगा अब शोषण यह नकली आज़ादी भी ख़ून हमारा पीती है औ’ सरमायेदारों की बस्ती में ही जीती है हँसिये की है भौंह तनी मिटके …

दोपहर

खोले पर आ गई दुपहरी हवा चुभौती तेज़ सुई-सी चकमक-चकमक धूप रुई-सी फैली चारों ओर घास पर डाल मसहरी अलसाये-से पत्ते डोले भेद थकन का मौसम खोले कुतर रही …