Category: किरन कपूर गुलाटी

प्रश्न चिन्ह

प्रश्न चिन्ह क्या ,क्यूँ ,कब ,कैसे इन्हीं शब्दों में सिमट जाती है ज़िन्दगी जवाब इनके मिलते नहीं कट जाती है ज़िन्दगी रिश्ते निभाने में बँट जाती है ज़िन्दगी देह …

चली जा रही हूँ

सावन की रातों में झडी़ जम के बरसती फूलों और पत्तों से अठखेलियाँ सी करती अजब हैं नजा़रे गरमीयों के मौसम में कभी आग बरसती कड़ाके की सर्दी में …

तू देख मेरे हुनर को देख

तू देख मेरे हुनर को देख देख ज़िन्दगी को
 मेरी नज़र से देख
 बिखरे हैं रंग कैसे२ रंगीनियों को देख
 नहीं कमी कुछ भी कहीं
 जा के आते नज़ारों …

जवाब नहीं होता

कई बार कुछ बातों का जवाब नहीं होता उठते हैं जब तूफ़ाँ आँधियोँ का हिसाब नहीं होता बढ़ जाती हैं कभी बेचैनियाँ तो प्रभु शरण बिना, रास्ता कोई और …

उडा़नो को हम ढूँढते हैं

न जाने ज़िन्दगी में हम क्या ढूँढते हैं बहारों का हर पल पता ढूँढते हैं कैसी अजब कश्मकश है यह पर नहीं हैं लेकिन,उड़ानों को ढूँढते हैं नहीं चलता …

मुस्कुराहटें

नहीं मुस्कुराहटों का कोई जवाब छिपें हैं इनमें हजा़रों राज़ चली आती हैं कभी नम आँखों के साथ कभी थम जाती हैं शर्मो हया के साथ चहक जाती हैं …

अद्भुत रंग बिरंगे धागे

ये अद्भुत रंग बिरंगे धागे खींचें मुझे और लेकर भागें है हर रंग निराला इनका कामनाओं से भी हैं भरपूर है सतरगीं दुनिया ये सारी कभी उभारे कभी कर …

एै ज़िन्दगी तेरे चेहरे हजा़र

किरन कपूर गुलाटी एै ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार हँसाए कभी तो
 कभी रुलाये ज़ार ज़ार
 समझना तुझे आसान नहीं कहीं होती है रुखसत 
तो कहीं लाती है बहार
 दिखाती …

अपना बेगाना

दिल नाज़ुक था फूलों से भी ज़्यादा मगर जा़लिम ज़माने ने कभी यह जाना नहीं बचाना चाहा था लाख हमने मगर छलनी जिसने किया था कोई अपना बेगा़ना नहीं