Category: कविता वाचक्नवी

रिश्ते-2

रंगी परातों से चिह्नित कर चलते पायल-से रिश्ते हँसी -ठिठोली की अनुगूँजें भरते, कलकल-से रिश्ते पसली के अंतिम कोने तक कभी कहकहे भर देते दिन-रातों की आँख-मिचौनी हैं ये …

मैंने दीवारों से पूछा

चिह्नों भरी दीवारों से पूछा मैंने किसने तुम्हें छुआ कब-कब बतलाओ तो वे बदरंग, छिली-खुरचीं-सी केवल इतना कह पाईं हम तो पूरी पत्थर-भर हैं जड़ से जन से छिजी …

भूकंप

मेरे हृदय की कोमलता को अपने क्रूर हाथों से बेध कर ऊँची अट्टालिकाओं का निर्माण किया उखाड़ कर प्राणवाही पेड़-पौधे बो दिए धुआँ उगलते कल-कारखाने उत्पादन के सामान सजाए …