Category: जया झा

सवाल

सवाल कईयों ने पूछे हैं, मैं पहली नहीं हूँ। सवाल सभी पूछते हैं, मैं अकेली नहीं हूँ। पर बहुत से लोग सवाल पूछ-पूछ कर थक गए। जवाब मिलने की …

वो दिन

देखा हमें बेरुखी से कई चैनल बदलते हुए ठंडी साँस ले कर उन्होंने कहा, “रविवार की एक फ़िल्म के लिए मचलने वाले, हाय, वो सीधे दिन गए कहाँ।” उन्हें …

देखने में रास्ता छूट गए हैं सब नज़ारे

देखने में रास्ता छूट गए हैं सब नज़ारे, मिल गई मंज़िल मग़र कब मिलेंगे अब नज़ारे। नहीं थी देनी फुर्सत गर देख पाने की हमें, रास्तों के बगल मे …

जो है मन में उनसे अब कविताएँ नहीं बनती

जो है मन में उनसे अब कविताएँ नहीं बनती। डुबाए बिना जो भिगो जाएँ, धाराएँ नहीं बहती। खुशियाँ बेरुखी सही, पर दर्द भी रसहीन है। बंजर मिट्टी पर कभी …

चलना और बदलना

पागलपन है पर पागलपन से ही दुनिया चलती जैसे। इंसानों के लिए इंसानियत सौ बार देखो गिरती कैसे। चिल्ल-पौं ये भाग दौड़, इक दूजे पर गिरना-पड़ना। गर्व से कहना,”हम …

घर

तिनके जोड़ लोगो को घर बनाते देखा है। बाढ़ में बहते हुए घर को बचाते देखा है। गिरते हुए घर को मज़बूत कराते देखा है। शायद कभी गुस्से में …

कौन सा है रास्ता जो यों मुझे बुला रहा?

कौन सा है रास्ता जो यों मुझे बुला रहा? धुंधला ये स्वप्न मुझे कौन है दिखा रहा? बदली कई बार मग़र राह अभी मिली नहीं चलने को जिसपर मेरा …

कहाँ ढूंढ़ूँ मैं अपना जहाँ

कहाँ ढंढ़ूँ मैं अपना जहाँ अपनी ज़मीं और आसमाँ। सपनों में अक्सर देखा है फूल वो खिलता है कहाँ? तारों से जो झरता है किसने देखा है वो झरना? …

कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है?

कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है? कोई वज़ह नहीं कि जी न सकें, हाथ में रखा जाम पी न सकें। मजबूत हाथों के होते भी, फिसलन की …