Category: गुरमीत बेदी

अपने भीतर

अपने भीतर धूप की शरारत के बावजूद जैसे धरती बचाकर रखती है थोड़ी-सी नमी अपने भीतर पहाड़ बचाकर रखते हैं कोई हरा कोना अपने वक्ष में तालाब बचाकर रखता …