Category: दीप्ति मिश्र

है काग़ज़ पर लिक्खी हुई ज़िन्दगानी

है काग़ज़ पर लिक्खी हुई ज़िन्दगानी औ’ चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी बहुत फ़र्क़ है, फिर भी है एक जैसी हमारी कहानी, तुम्हारी कहानी न था कुछ, न …

हक़ीक़त की तह तक पहुँच तो गए हैं

हक़ीकत की तह तक पहुँच तो गए हैं लेकिन मगर सच में ख़ुद को उतारेंगे कैसे। न जीने की चाहत, न मरने की हसरत यूँ दिन ज़िन्दगी के गुज़ारेंगे …

सब्र का ज्वालामुखी धधका है फूटेगा ज़रूर

सब्र का ज्वालामुखी धधका है फूटेगा ज़रूर सुर्ख़ लावा बह चला है, बाँध टूटेगा ज़रूर लील जाएगा सभी कुछ आग का दरिया मगर राख का इक ढेर पीछे फिर …

वो मेरे आसपास था क्यूँ था

वो मेरे आसपास था, क्यूँ था और बेहद उदास था, क्यूँ था प्यास थी बेपनाह और मय थी फिर भी ख़ाली गिलास था, क्यूँ था ख़्वाब ताबीर होके आया …

रहें ख़ामोश हम कब तक जो बोलें भी तो बोलें क्या

रहें ख़ामोश हम कब तक, जो बोलें भी तो बोलें क्या अजब-सी बेक़रारी है, कहीं सिर रख कर रो लें क्या बहुत-सी रोशनी है फिर भी, कुछ दिखता नहीं …

दिल तो पत्थर हो गया धड़कनें लाएँ कहाँ से

दिल तो पत्थर हो गया, धड़कनें लाएँ कहाँ से वक़्त हमको ले गया है, लौट के आएँ कहाँ से एक खिलौना है ये दुनिया और बचपन खो गया है …

जिस्म क्या चीज़ है ये जाँ क्या है

जिस्म क्या चीज़ है ये जाँ क्या है और दोनों के दरमियाँ क्या है इक ख़ला भीतर, इक ख़ला बाहर फिर मुकम्मल-सा ये जहाँ क्या है चार दीवार, छत, ज़मीं वालो …

कोई चाहत, कोई हसरत भी नहीं

कोई चाहत, कोई हसरत भी नहीं क्यूँ सुकूँ दिल को मेरे फिर भी नहीं जाने क्यूँ मिलती रही उसकी सज़ा जो ख़ता हमने अभी तक की नहीं हम भला …

उसने कितनी सादगी से आज़माया है मुझे

उसने कितनी सादगी से आज़माया है मुझे है मेरा दुश्मन मगर मुन्सिफ़ बनाया है मुझे मैं भला उस शख़्स की मासूमियत को क्या कहूँ कहके मुझको इक लुटेरा घर …