Category: चंद्र रेखा ढडवाल

हम बहेंगे

हम बहेंगे हम नहीं लड़ेंगे पाप के विरुद्ध पुण्य की विजय असत्य के विरुद्ध सत्य की विजय साधने के लिए. हम नहीं अड़ेंगे पागल साँड-सी बिफरती भीड़ के सन्मुख …

सरोकार

सरोकार भव्यताओं के ऊपर से उड़कर आते गिद्ध मांस गंध से आकर्षित हो तुम्हारी छत पर समेटते पंख चोंच की धार परखते डुबकी लगाते आनंद सरोवरों में और पसार …

मैंने समझा

तुमने हँसी की होगी दिन भर की की उकताहट उड़ा देने को ही उधेड़कर धागे झटके से तोड़ दिए होंगें और मैंने समझा तार-तार मेरी चादर ने तुम्हें उकसाया …

मुठभेड़ के बाद

मुठभेड़ के बाद आसपास के सारे माहौल को उसके सारी आकांक्षाओं सफलताओं/ विफलताओं सहित जी लेने की कोशिश कोई बहुत बड़ा अभियान नहीं है अगर तुमें यह सहूलियत हो …

मस्तक पर ठुकी कील

मस्तक पर ठुकी कील मोर हो फ़ाख़्ताओं के पैरों से नाचना बहुत कठिन है/तब और भी कठिन जब फ़ाख़्ताओं को देखते/तुम्हें सोचना पड़े कि तुम्हारे पंखों का विस्तार उचित …

प्रार्थना

पथरीली ज़मीन और धूप के बावजूद आकाश देखते हुए अंकुर सब चीज़ों का भविष्य नहीं कुछ को चाहिए बूँद-बूँद धरती चूमती बारिश का सम्बल तन सहलाती कोमल मिट्टी का …

पिता-3

पिता (तीन) पिता ! मेरी आँखें तो खोजती रहीं केवल तुम्हें दिन ढले आँखों की फैली-फैली आँखों की लाली में दहाड़ती आवाज़ की भयावहता में माँ की पीठ पर पड़ती …

पिता-2

पिता (दो) पिता मैंने कल्पना की तरलता में पले/बढ़े ये स्वप्न नहीं देखे मैंने तो मध्याह्न में कागज़ की पुड़िया में लिपटी गेहूँ की साबुत रोटी पर सालन भी …

पहाड़ों पर बर्फ़

पहाड़ों पर बर्फ़ दिनों की गर्जन उपरान्त सहसा ही हल्के काले बादलों ने नीले आकाश को छाकर मौन साध लिया इस चुप्पी को किसी अनिष्ट का संकेत मान सहमी …

धूप के अनुरूप

धूप के अनुरूप धूप बदलती है अपना अधिकार क्षेत्र जिसके अनुरूप बिना किसी द्वन्द्व के मैं अपना स्थान बदल लेती हूँ भ्रष्ट होते जाने की प्रक्रिया कितनी अनाम कितनी …